bhaskar Web English
HomeNewsChhattisgarhRaipur Raipur

हौसले के सहारे रची अपनी दुनिया

रायपुर. डा. लता जैन (28) उन लोगों के लिए प्रेरणा हो सकती हैं, जो निशक्त होने पर खुद को दूसरों पर निर्भर समझते हैं। उन्होंने दिखा दिया कि अदम्य इच्छा शक्ति और लगन हो तो शारीरिक अक्षमता भी रुकावट नहीं बन सकती। लता ने एक बार भी विकलांग कोटे का फायदा नहीं लेकर इसे साबित भी किया।

राजनांदगांव के गांव कोहका-टप्पा (तुमड़ीबोड़) की डा. लता अपने तीनों भाईयों से आगे बढ़ गईं। उनके एक भाई प्रोफेसर और दो बिजनेसमैन हैं। पिता गंभीरमल जैन का सीना गर्व से फूल जाता है, जब वह अपनी बेटी की प्रशंसा सुनते हैं।

बचपन में डा. लता का एक पैर पोलियो ने खराब कर दिया। वह बिना कैलीपर्स के चल नहीं पाती, फिर भी हीन भावना नहीं पाली। प्राइमरी से हायर सेकंडरी स्कूल तक की शिक्षा उन्होंने राजनांदगांव के गांधी मेमोरियल स्कूल में पूरी की।

10वीं कक्षा में उसने 72 और 12वीं में 75 फीसदी अंक लाए। लता मेडिकल लाइन में जाना चाहती थी। लेकिन परिवार इतना सक्षम नहीं था कि उसे पीएमटी की महंगी कोचिंग दिला सके। लता ने दिग्विजय कालेज से बीएससी करते हुए पीएमटी की तैयारी जारी रखी। जब वह सेंकड इयर में थी, तब पीएमटी में स्कोर तो अच्छा किया लेकिन एमबीबीएस के बजाय वेटनरी की सीट मिली।

मायूस होने के बजाय लता ने अंजोरा वेटरनरी कालेज में प्रवेश लिया। यह लता के लिए दोहरी चुनौती थी, क्योंकि मवेशियों के इलाज में उन्हें परेशानी आ सकती थी। लता ने इसका सामना किया और 2004 में वह वेटरनरी में ग्रेजुएट (82 प्रतिशत) हुई।

इंटर्नशिप के बाद आईसीएआर (इंडियन कौंसिल फार एग्रीकल्चरल रिसर्च) की फैलोशिप परीक्षा दी। इसमें 97वां रैंक मिला। उसे पोस्ट ग्रेजुएट के लिए 8000 रुपए महीने की छात्रवृति मिली। डा. लता ने गुजरात के आणंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से पीजी किया। उसने 83 फीसदी अंक पाए। लता ने राजनांदगांव में प्राइवेट नौकरी की। साथ ही वे सीएसआईआर ( काउंसिल फार साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) परीक्षा की तैयारी करने लगी।

एक ही प्रयास में उन्हें दोनों परीक्षा में सफलता मिली। पीएचडी के लिए उन्हें पांच साल तक 13000 रुपए की फैलोशिप मिली। लेकिन छह महीने बाद उन्हें एआरएस टेस्ट (एग्रीकल्चरल रिसर्च साइंटिस्ट) में भी सफलता मिली।

अभी वे एकेडमिक फार एग्रीकल्चरल एंड रुरल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग में चार महीने के लिए हैदराबाद गई हैं। उन्हें अभी 25 हजार रुपए महीने का वेतन मिल रहा है। उनका पद वेटरनरी साइंटिस्ट का है। यह उपलब्धि कुछ ही लोगों को मिलती है। पोस्टिंग होने के बाद उन्हें तकरीबन 6 लाख रुपए सालाना वेतन मिलेगा। इसी बीच उनका सलेक्शन गुजरात के एक कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए हुआ।

यूएस की डिग्री नया लक्ष्य
डा. लता साइंटिस्ट बनकर देश का नाम रोशन करना चाहती हैं। वे इसी क्षेत्र में पोस्ट डाक्ट्रेट करने यूएएस जाना चाहती हैं। यह डिग्री भारत में नहीं मिलती। वे कहती हैं कि बेजुबान प्राणियों की सेवा में खुशी मिलती है। वे अपनी परेशानी बता नहीं सकती। वे अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को देती हैं। उनका मानना है कि अपने को कभी भी दुर्बल नहीं समझना चाहिए।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: