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‘गांधीजी नहीं चाहते थे दलितों में नेतृत्व’

अहमदाबाद.डॉ. योगेंद्र मकवाना कांग्रेस की राष्ट्रीय अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. योगेंद्र मकवाना की पुस्तक में गांधीजी को लेकर की गई टिप्पणियां पार्टी के लिए सिरदर्द बन सकती हैं।

मकवाना ने अपनी पुस्तक ‘कपरा चढाण’ (कठिन चढ़ाई) के पृष्ठ क्रमांक 220 अध्याय 8 में लिखा है कि, 'गांधीजी को यह मंजूर नहीं था कि दलितों में स्वतंत्र तथा चुनौतीपूर्ण नेतृत्व पैदा हो। वे हमेशा उन्हें हिंदू समाज की सेवा करने वाले वर्ग के रूप में ही रखना चाहते थे।'

पुस्तक की टिप्पणियों से गुजरात कांग्रेस में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। पुस्तक पर प्रतिक्रिया जानने के लिए यात्रा में होने के कारण मकवाना से संपर्क नहीं हो सका और कांग्रेस के अन्य नेता कुछ बोलने को तैयार नहीं हुए।

गांधीजी जबरन बने थे दलित नेता : पुस्तक के अध्याय ‘गांधी-आंबेडकर विचारधारा तथा इसका सामाजिक संदर्भ’ में गांधीजी को लेकर टिप्पणियां की गई हैं। लेखक के अनुसार, 'जबरदस्ती दलितों के नेता बनकर उन्हें मिलने वाले अलग मताधिकार से दलितों को वंचित रखने का गांधीजी को कोई अधिकार नहीं था।' पुस्तक में लिखा है कि वर्णाश्रम व्यवस्था तथा हिंदूधर्म के इस पुजारी की गलतबयानी से दलितों में हिंदूधर्म तथा गांधीजी के प्रति नफरत की भावना पैदा हुई। इसके बाद दलित वर्ग के लाखों लोगों ने मुस्लिम, ईसाई तथा बौद्ध धर्म अपनाया। लेखक का निष्कर्ष है कि हिंदू धर्म की एकता के नाम पर दलितों को ठुकराए जाने के फलस्वरूप यह हुआ। इसकी जिम्मेदारी सही अर्थो में गांधीजी की है, इसे कौन नकार सकता है।

हरिजन सेवा सिर्फ राजनीतिक ध्येय : पुस्तक के मुताबिक गांधीजी संपूर्ण रूप से एक विलक्षण राजनेता थे। समाज सेवा तथा हरिजन सेवा उनके लिए राजकीय तथा वर्णाश्रम धर्म की रक्षा का ध्येय हासिल करने के साधन मात्र थे।





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