bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

गॉसिप का बढ़ता बाजार

दृष्टिकोण. गॉसिप का बढ़ता बाजार एक वक्त था जब पड़ोसियों के साथ किसी अन्य पड़ोसी या सगे-संबंधी के बारे में चटपटी बातें अंतहीन मनोरंजन का जरिया बनती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है। इक्कीसवीं सदी की करोड़ों की गॉसिप इंडस्ट्री में पड़ोसी और सगे-संबंधी गौण हो गए हैं। अब तो लोकप्रियता के भूखे छोटे-मोटे सतही ‘सेलिब्रिटीज’ से लेकर असल अंतरराष्ट्रीय ‘सितारे’ गॉसिप के अलाव को भड़काते हुए इसके कारोबारियों की तिजोरियां भरने में मदद कर रहे हैं। नई तकनीकों के सहारे तेजी से वैश्विक होती जा रही विशाल मीडिया इंडस्ट्री में गॉसिप लेखन बेहद संभावनाशील कैरियर विकल्प के रूप में उभर रहा है।

गॉसिप लेखन की इस सुपरफास्ट इंडस्ट्री के इस मौजूदा अभूतपूर्व समृद्धि तक पहुंचने के कई कारण हैं। पूरी दुनिया में संचार तकनीक अभूतपूर्व ढंग से बढ़ रही है। सूचना जुटाने के लिहाज से करामाती इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मसलन टेली-कैमरे, कंप्यूटर्स, टेलीफोन व रिकॉर्डर्स, छिपे हुए सेलफोन कैमरे के अलावा दूसरे छोटे-छोटे उपकरण सेलिब्रिटी का पीछा करने को एक साहसिक, रोमांच से भरपूर पेशा बनाते हैं, जिसमें काफी पैसा है। ज्यादा से ज्यादा पत्रकार, कैमरा पर्सन और फिल्म या टीवी निर्माता इसके साथ जुड़ना चाहते हैं क्योंकि उन्हें इसमें भरपूर पैसे के साथ काफी नाम या कम से कम आलोचना तो मिलती है, जिसके भी अपने अलग फायदे हैं!

निस्संदेह गॉसिप पत्रकारिता की लोकप्रिय परिकल्पना की शुरुआत काफी पहले हुई। ऐसे कई पत्रकार थे जो हॉलीवुड सितारों के बारे में लिखकर अपनी पत्रिकाओं की बिक्री बढ़ा लेते। हमारे अपने देश में ‘फिल्म इंडिया’ जिसके संपादक बाबूराव पटेल अपनी क्रूर-कलम के लिए ख्यात रहे, ने ‘मानो या न मानो’ पत्रकारिता का वह ट्रेंड स्थापित किया जिसने दिलीप कुमार, नर्गिस और मधुबाला जैसे सितारों को रोष और कुंठा की आग में काफी जलाया। उनके निजी प्रेम प्रसंगों को उजागर करके पाठकों को गुदगुदाया जाता रहा। लेकिन इन गॉसिप से संबंधित सितारे का पारिवारिक जीवन उजड़ गया। इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करना ठीक होगा। ‘दुनिया न माने’ जैसी कालजयी फिल्म की प्रतिभावान गायिका शांता आप्टे के बारे में कहा जाता है कि एक बार उन्होंने पटेल के ऑफिस में पहुंचकर उनकी जूतों से पिटाई कर दी, क्योंकि उनके अखबार में शांताजी पर अपने भाई के साथ अवैध संबंधों का आरोप लगाया गया था। ऐसी घटनाओं के बावजूद कम से कम फिल्म इंडस्ट्री में तो यह ट्रेंड चलता रहा। आगे चलकर और भी कई फिल्म पत्रिकाएं लांच हरुई, फिल्मों से संबंधित खबरों और प्रदर्शित फिल्मों की क्वालिटी पर चर्चा करने के लिए नहीं वरन फिल्मी सितारों और सोशल हाई-सर्किल से जुड़े दूसरे लोगों की निजी जिंदगी के बारे में बताने के लिए।

जल्द ही यह तकनीक समाज के अन्य क्षेत्रों से जुड़ी सेलीब्रिटीज पर भी लागू होने लगी। पेंटर्स, ब्यूटी क्वींस, उच्चवर्गीय रईस, स्पोर्ट्स स्टार्स, कारोबारी दिग्गज, मॉडल्स और डिजायनर्स, सितारों और सुंदरियों को संवारने वाली ब्यूटीशियंस समेत कोई भी शख्स, जिसके जीवन से मसालेदार कहानी मिले, उसे गॉसिप की चक्की में पीस दिया जाता है।

कई मीडिया विशेषज्ञों ने गॉसिप की इस व्यापक पैमाने पर बढ़ती लोकप्रियता को लेकर एक संभाव्य सिद्धांत पेश किया है। यह सिद्धांत कहता है कि आज हम सभी अपने परिजनों की अपेक्षा सेलिब्रिटीज के बारे में ज्यादा जानते हैं। दोस्ती और पारिवारिक संबंधों में अब पहले जैसी निकटता नहीं रही और शहरी तनावपूर्ण जीवन और पैसे के पीछे मची गलाकाट होड़ के चलते समय के साथ-साथ रिश्तों के मायने बदल रहे हैं। ऐसे में हम सिर्फ उन्हीं की जिंदगी के बारे में पढ़कर या चर्चा कर अपनी उत्सुकता शांत कर सकते हैं, जिनके लुक्स, सफलता, अमीरी, उपलब्धियों और लाइफस्टाइल से हम मन ही मन ईष्र्या करते हैं। हमारे दौर का यह अजीब सत्य है कि जहां हम फिल्मी सितारों और बड़ी-बड़ी शख्सियतों से जुड़ी छोटी-से-छोटी बात भी जानते हैं, वहीं शायद अपने सहकर्मियों के बारे में कुछ नहीं जानते जिनके साथ हम रोज काम करते हैं या फिर उन सगे-संबंधियों के बारे में भी हमें ज्यादा पता नहीं होता जो हमारे परिवार से जुड़े हैं।

हर देश में ऐसे छोटे-मोटे क्षणिक चमक बिखेरने वाले सेलिब्रिटीज भरे पड़े हैं जो हमारी उत्सुकता को हवा देते हैं और अखबारों या टीवी कार्यक्रमों में छाए रहते हैं। ये सेलिब्रिटीज सिर्फ पार्टियां अटेंड करने या अपने अफेयर्स के लिए ही चर्चा में होते हैं। इसके अलावा और किसी वजह से ये सुर्खियों में नहीं आते। इनमें से कुछ तो असल सेलिब्रिटी जगत के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं और किसी तरह प्रिंट या कैमरे में जगह पा जाते हैं।

इस संदर्भ में मीडिया राइटर दीप्ति गुप्ता का कहना है ‘अब ऐसा कुछ नहीं बचा है, जिसे गॉसिप राइटर्स के लिए ‘पावन’ कहा जा सके।’ ‘यहां तक कि शीर्ष स्तर की असल सेलिब्रिटीज को मीडिया के जरिए अपनी निजी बातों को सार्वजनिक करने में भी शर्मिदगी महसूस नहीं होती। वे सार्वजनिक स्थानों पर किसिंग, स्मूचिंग या लड़ाई-झगड़ा करते पकड़े जाते हैं ताकि गॉसिप प्रेस विश्वव्यापी स्तर पर इस खबर का धमाका कर सके और मिनटों में ही बिक जाने वाली इस न्यूज और फुटेज के जरिए पैसा बरसे। शाहिद और करीना की किसिंग का सेलफोन वीडियो एक मिसाल है, जिसके जरिए कई टीवी चैनलों और अखबारों ने पैसा कमाया। मीडियाकर्मी मौके के इस दौर को समझते हैं और लोगों की उत्सुकता भड़काने के लिए सेलिब्रिटीज को किसी भी हद तक र्श्िमदा कर सकते हैं। मीडियाकर्मियों के बारे में कहा जाता है कि वे सेलिब्रिटीज का पीछा कर उन्हें कुछ ऐसा कहने या करने के लिए उकसाते हैं, जिससे वह अपने नियोक्ता से तारीफ पा सके और मीडिया जगत में भी उसकी कुछ साख बने कि उसने कुछ किया है।’

सिर्फ फ्रांस जैसे देश ही इसका अपवाद हैं जहां प्राइवेसी के कानून इतने सख्त हैं कि गॉसिप लेखक अपने जोखिम पर ही ‘रहस्योद्घाटन’ कर सकते हैं। बाकी देशों में विशेषकर अमेरिका, ब्रिटेन और अब भारत में भी प्रिंट और टेलीविजन मीडिया में गॉसिप रिपर्ो्िटग पर तब तक कोई रोक-टोक नहीं है, जब तक कोई गंभीर बात न हो। मिसाल के तौर पर भारत में सबके लिए खुले परिदृश्य में गॉसिप लेखक और पाठक सबके लिए चारा बन गया है। दैनिक अखबार, तमाम टीवी चैनलों, इंटरनेट पर और यहां तक कि उन सभी समूहों में जो किसी संध्या सैर के लिए मिलते हैं या किशोरवय युवाओं की पार्टियों में भी इनको लेकर काफी चर्चा होती है। यह लोकतांत्रिक समाज में सच्च समकारी बन गया है जहां लोग उनके बारे में सच और अटकलबाजियों का आनंद उठाने के लिए स्वतंत्र हैं जो किसी दूरस्थ जगह पर रहते हैं जिसे ‘फेम सिटी’ कहा जाता है।

-लेखिका फेमिना की पूर्व संपादक हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: