सम्पादकीय. कमोबेश हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर आजकल भूख फिर बहस का मुद्दा बन रही है। संयुक्त राष्ट्र का खाद्यान्न व कृषि संगठन (एफएओ) दुनिया के करीब 37 देशों में अनाज की किल्लत के कारण सामाजिक व राजनीतिक संकट गहराने की चेतावनियां दे रहा है। पूरी दुनिया में खाद्य पदार्थो की कीमतें पिछले एक साल में तेजी से बढ़ी हैं। चावल और गेहूं दुनिया के कई देशों की प्लेट से गायब हो चुके हैं। मिस्र की तो करीब आधी जनसंख्या राशन की ब्रेड से पेट भरती है। उसका कारण भी है। खुले बाजार में ब्रेड 12 गुनी कीमत पर मिल रही है। अगर राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को वहां मुल्क की सेना को ब्रेड बनाने और बांटने के काम में लगाना पड़ा है, तो दूसरे उन तमाम मुल्कों को मसले की गंभीरता समझ लेनी चाहिए जहां गरीब और कुपोषित लोगों की भारी जनसंख्या है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जैसे कुछ लोग हैं, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्यान्न की कीमतों में इजाफे के लिए भारत और चीन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मजेदार बात यह है कि भारत में अब भी करीब 20 फीसदी लोग कुपोषण का शिकार हैं। देश के करीब आधे बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल रहा है और करीब इतनी ही गर्भवती माताएं कुपोषण के कारण ऐसे बच्चों को जन्म दे रही हैं, जिन्हें जिंदगी भर बीमारियों से जूझना पड़ता है।
नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन जैसे लोग इसे सरकारों की सब्सिडी और वितरण प्रणाली की विफलता मानते हैं। एशिया व अफ्रीका के ज्यादातर विकासशील, गरीब और कमजोर मुल्कों की अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच ही नहीं है। उनके लिए वहां से अनाज खरीदना ही नहीं, अपनी जनता तक पहुंचाना एक स्वप्न से कम नहीं है। वहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली भ्रष्ट और निकम्मी होने से सरकारों की दी हुई सब्सिडी का लाभ भी अंतिम आदमी तक नहीं पहुंचता। ऐसे में अमेरिका मक्का से जैव ईंधन बनाने में लग जाए तो भगवान मालिक है।
अनाज के इस गंभीर संकट से बाहर निकलने के उपाय जगजाहिर हैं। फिलहाल अफ्रीका और एशिया के कई देशों को अपने खाने के ढंग में बदलाव लाना होगा। आयातित अनाज को छोड़कर स्थानीय अनाजों पर निर्भरता बढ़ानी होगी। सरकारों को कृषि उत्पादन ही नहीं बढ़ाने होंगे, बल्कि कृषि की लागत को कैसे घटाया जाए, इस पर ध्यान देना होगा। आप किसानों को ऊंचा मूल्य दिलाने के लिए मुल्क की बड़ी आबादी को खाने की पहुंच से बाहर नहीं कर सकते हैं। यह सिर्फ चुनावी मसला नहीं है, बल्कि भारत जैसे देशों का भविष्य इसी से तय होगा।