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राज से नाराज होने का कोई कारण नहीं बनता

विशेष टिप्पणी. राज ठाकरे या उनकी पार्टी को निशाना बनाने से समस्या नहीं सुलझेगी। उनकी कोई गलती भी नहीं है। बाल ठाकरे ने वर्षो तक मुंबई पर राज किया और अब भी कर रहे हैं। पाकिस्तान की क्रिकेट टीम मुंबई में खेल सकती है या नहीं, इसका फैसला भारत सरकार नहीं शिव सेना करती है। पाकिस्तानी कलाकार मुंबई में बनने वाली फिल्मों में तो काम कर सकते हैं पर शहर मुंबई में कोई कार्यक्रम पेश कर सकते हैं या नहीं इसका निर्णय ठाकरे परिवार करता है। इसी प्रकार किस फिल्म का प्रदर्शन मुंबई के सिनेमाघरों में नहीं हो सकता यह भी कोई सेंसर बोर्ड या शहर का प्रशासन नहीं तय करता। पर ये हालात केवल मुंबई तक सीमित नहीं हैं। ‘परजानिया’ हो या आमिर खान की कोई फिल्म, गुजरात में उसका प्रदर्शन हो सकता है या नहीं देश का कानून नहीं तय करता।

तमिलनाडु के एक गांव में सवर्णों ने गैर-सवर्णो की बस्ती से अपने आपको अलग करने के लिए एक ऊंची दीवार खड़ी कर रखी है। तमिलनाडु में हिंदी का कोई पोस्टर या साइन बोर्ड मुश्किल से दिखाई देगा। कर्नाटक विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों के लिए जारी घोषणापत्र में इस महान देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी का जो घोषणापत्र जारी किया है उसमें मांग की है कि बेंगलूर की आई.टी. कंपनियां रोजगार के तीस प्रतिशत स्थान स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित रखें। स्थानीय लोग, स्थानीय हित, लोकल पार्टियां, लोकल झंडे - यानी कि क्षेत्रवाद समूची व्यवस्था पर आज हावी हो रहा है और कान केवल राज ठाकरे के पकड़े जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में देश के दूसरे भाग में रहने वाला भारतीय जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकता। वहां का रसीदी टिकट भी शायद अलग है। यही स्थिति और राज्यों की है। उत्तर-पूर्वी राज्यों से उत्तर भारतीयों और मारवाड़ियों को या तो खदेड़ा जा रहा है या उन्हें लूटा जा रहा है और उनकी हत्याएं की जा रही हैं।

कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच सीमा विवाद हो या फिर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी के जल बंटवारे को लेकर चल रही लड़ाई। स्थानीयता को लेकर देश का जो नए सिरे जो विभाजन हो रहा है उसे केवल टुकड़ों-टुकड़ों में देखा जा रहा है। एक नए किस्म का उग्रवाद देश में तेजी से पनप रहा है। राजनीतिक स्तर पर जैसे-जैसे दलों के बीच विभाजन बढ़ता जाएगा और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे पर हावी होते जाएंगे वैसे-वैसे स्थानीयता ज्यादा से ज्यादा हिंसक होती जाएगी।

मामला अब भावनाओं या राष्ट्रीय भावनात्मकता का नहीं बचा है। नौकरियों में मिलने वाली जगहें, सर छुपाने के लिए जमीन और छत का इंतजाम, पीने के लिए पानी की उपलब्धता और खाना पकाने की गैस प्राप्त करने के लिए बढ़ती हुई वेटिंग लिस्ट - इन सबका संबंध स्थानीय और भाषायी हितों से है। राजनीतिक दल और राजनेता जानते हैं कि सत्ता की राजनीति करने के लिए मतदाताओं की किन रगों पर हाथ रखने से सबसे ज्यादा दर्द होता है। आबादी के मान से हमारे देश के कुछ महानगरों में योरप के कई छोटे-छोटे देश समा सकते हैं। दो महानगरों को मिला दें तो आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की कुल आबादी का मुकाबला कर सकते हैं। जिस अराजकता की ओर देश को आज धकेला जा रहा है, वह आगे चलकर काफी खतरनाक साबित हो सकती है। इस तरह के विचारों को स्थान देना शायद अतिरंजित भय भी माना जा सकता है कि कभी हमारे द्वारा ही बनाए और बसाए गए शहर केवल इस कारण हमारे लिए ही परदेस हो जाएं कि हमें स्थानीय होने का लाइसेंस प्राप्त नहीं है। शहर के ‘असली’ नागरिकों को अन्य भारतीयों से अलग साबित करने के लिए पहचानपत्र जारी होने लगे। कुल मिलाकर यह कि हमें अपने ही देश में अलग-अलग जगहों पर रहने और कार्य करने के लिए वीजा और वर्क परमिट लेना पड़े। पानी के बंटवारे की लड़ाई आगे चलकर दूध और अनाज की निकासी की शर्ते तय करने लगे।

इतिहास का कहना है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। अगर ऐसा है तो हम लोग, शायद दुनिया भर में, सहिष्णुता के दौर से मुक्त होकर कबीलाई संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। एक कबीले के जानवर को दूसरे कबीले के जानवरों से अलग दिखाने के लिए तेज आग में लाल किए गए निशानों से दागे जाने का चलन रहा है। हो सकता है आगे चलकर इंसानों का भी इसमें शुमार होने लगे। शायद हमारी पहचान हमारी वृहत भारतीयता से कम और हमारी स्थानीयता से ज्यादा होने लगे। केवल राज ठाकरे के प्रति नाराजगी व्यक्त करने का कोई कारण नहीं बनता।





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sandeep
Monday, 12th May 2008, 10:02
Bcoz Raj is showing his impatience and immaturity.