भोपाल. मंहगाई को उजागर करने वाली मुद्रास्फीति की दर का आम उपभोक्ताओं की जेब से कुछ लेना-देना नहीं है। सरकारों, व्यवसायियों और सामान्य लोगों को बेचैन करने वाला यह आंकड़ा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की बजाए थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आधार पर निकाला जाता है। सीपीआई के आधार पर इसकी गणना की जाए तो मंहगाई की मौजूदा दर में कई गुना इजाफा हो सकता है। दुनिया के अनेक देशों में सीपीआई के आधार पर मंहगाई का लेखा-जोखा किया जाता है।
थोक व्यापार को प्रभावित करने वाले डब्ल्यूपीआई पर आधारित मुद्रास्फीति की दर का पहला प्रकाशन 1902 में हुआ था। इसमें ऐसी 435 चीजों के आधार पर मंहगाई का हिसाब-किताब किया जाता है जिनमें से करीब सौ चीजें आजकल बेमानी हो चुकी हैं। मसलन मोटे अनाज आजकल पशु आहार की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं जबकि इनकी गणना मानव खाद्य की तरह की गई है। दूसरे, इसमें सेवा क्षेत्र की कोई गणना नहीं की जाती। नतीजे में स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन जैसी बुनियादी सेवाओं का आंकलन नहीं हो पाता। ये सेवाएं आज के दौर में आम लोगों की आय पर भारी दबाव डालती हैं।
70 के दशक में आई सीपीआई गणना की पद्धति में खाद्य पदार्र्थो और सेवाओं को जोड़कर हिसाब किया जाता है। इसमें खर्च के कारण आम लोगों की जेब पर पड़ने वाले भार की बास्केट बनाई जाती है। इससे सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले मंहगाई के प्रभावों का आंकलन किया जाता है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, कनाडा, सिंगापुर और चीन में इसी पद्धति से मंहगाई की गणना की जाती है।
थोक व्यापार के आधार पर मुद्रास्फीति का हिसाब रखने वाली सरकार का कहना है कि डब्ल्यूपीआई हर हफ्ते जारी की जाती है इसलिए मंहगाई पर साप्ताहिक निगरानी रखी जा सकती है। सीपीआई हर महीने जारी होना चाहिए, लेकिन इसमें महीनों लग जाते हैं।
राज्य का मानव विकास प्रतिवेदन तैयार करने वाली संस्था ‘संकेत’ के बजट विश्लेषक मनीष शंकर ने भास्कर को बताया कि टेलिफोन, अस्पताल, स्कूल, बीमा, बेंक यहां तक कि होटल और ब्यूटी पार्लर तक में 12.5 प्रतिशत सेवा कर लगता है। ऐसी जरूरी सुविधाओं के आंकलन के बिना मुद्रास्फीति या महंगाई की गणना नहीं की जा सकती।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की उपाधि लेकर आदिवासियों का संगठन चला रहे सुनील महंगाई की गणना की मौजूदा पद्धति को अधूरी मानते हैं। उनका कहना है कि मीडिया में रोज प्रकाशित हो रही मुद्रास्फीति की दर के आंकड़े आम लोगों पर पड़ने वाली महंगाई की मार के बारे में कुछ नहीं बताते। अलबत्ता सरकारें इसी गणना के आधार पर महंगाई पर अंकुश लगाने के उपाय करती है। रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं के दामों की बजाए थोक व्यापार पर नियंत्रण करने से आम लोगों को राहत नहीं मिल पाती। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक महंगाई को काबू में लाने के सरकारी उपायों का इसीलिए कोई असर नहीं दिखता।