जयपुर. राज्य में पशुपालन विभाग छह साल तक केंद्र प्रवर्तित योजनाओं की राशि खर्च करने में विफल रहा। इसके अलावा कृत्रिम गर्भाधान के लिए पशुपालकों से वसूली गई फीस के ग्रामीण इकाइयों पर बकाया दो करोड़ 68 लाख रुपए का भी आवश्यक हिसाब-किताब नहीं मिला है।
भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ओर से पशुपालन विभाग की विशेष ऑडिट में इस तरह की गड़बड़ियां सामने आई हैं। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार विभाग ने केंद्र प्रवर्तित योजनाओं के 72 लाख 20 हजार रुपए छह साल तक खर्च ही नहीं किए। इसमें जयपुर में बूचड़खाने के आधुनिकीकरण के लिए दिए गए 50 लाख रुपए एवं इंटीग्रेटेड पिगरी डवलपमेंट स्कीम में 22.20 लाख रु. शामिल है। पशुगणना के लिए केंद्र की ओर से दिए एक करोड़ 87 लाख रु. खर्च करने में भी पशुपालन विभाग विफल रहा। कृत्रिम गर्भाधान की फीस के रूप में वसूले गए दो करोड़ 68 लाख रुपए मार्च 2007 तक ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित इकाइयों पर बकाया चल रहे थे।
ऑडिट रिपोर्ट में इस पर एतराज उठाते हुए कहा गया है कि कृत्रिम गर्भाधान फीस के आय-व्यय खातों का आवश्यक संधारण नहीं किया गया। विभागीय अधिकारियों ने अपनी जमीनों अचल संपत्तियों का रजिस्टर भी संधारित नहीं किया। साथ ही इन संपत्तियों की देखरेख भी नहीं की गई। इस कारण कोटा पोलट्री फार्म, बस्सी में किशनपुरा फार्म एवं फतेहपुर शीप ब्रीडिंग फार्म की जमीन पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिए।
नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डवलपमेंट (नाबार्ड) की ओर से कराए गए सर्वे में पशुपालन विभाग की जो खामियां बताई गई थी, विभागीय अधिकारियों ने उन्हें दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। रिपोर्ट में इस बात पर आपत्ति जताई गई है कि विभाग ने आंतरिक ऑडिट को भी नजर अंदाज किया।
कहां की गई ऑडिट
सीएजी ने पशुपालन विभाग के वर्ष 2002-07 के रिकॉर्ड की विशेष जांच की। इसके तहत पशुपालन निदेशक कार्यालय एवं अजमेर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर, कोटा, सीकर एवं उदयपुर जिले के विभागीय कार्यालयों, बस्सी स्थित सीमन बैंक, रीजनल बॉयोलोजिकल प्रॉडक्ट्स लेबोरेट्री जामड़ोली, कुम्हेर एवं रामसर के कैटल ब्रीडिंग फार्म, खातीपुरा पोल्ट्री फार्म और सीकर के फतेहपुर स्थित शीप ब्रीडिंग फार्म के रिकॉर्ड की जांच की।
* सीएजी की रिपोर्ट निदेशालय में आती है। मुझे अभी इसकी जानकारी नहीं है।
-एलपी कोठारी, प्रमुख सचिव, पशुपालन विभाग