बीकानेर.
राज्य में करीब पांच साल बाद शिक्षक समानीकरण की कवायद एक बार फिर शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने शिक्षा विभाग से शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों की रिपोर्ट मंगवा ली है। जयपुर में पिछले दिनों हुई माध्यमिक शिक्षा विभाग की बैठक में जिला शिक्षा अधिकारियों ने प्रस्ताव निदेशक को सौंप दिए।
समानीकरण के प्रस्तावो ंमें नयापन नहीं है। पिछले चार-पांच साल से जिला शिक्षा अधिकारियों से प्रस्ताव मंगवाए जा रहे हैं।
बताया जाता है कि पुराने प्रस्तावों में ही थोड़ा फेलबदल करके नए प्रस्ताव तैयार किए गए हैं। समानीकरण शिक्षक तबादलों के साथ होने का अनुमान लगाया जा रहा है। पिछले वर्ष शिक्षक तबादलों के कारण प्रदेश में शिक्षा तंत्र गड़बड़ा गया था। ग्रामीण क्षेत्र की स्कूलें लगभग खाली हो गई। विभाग को बाद में नई नियुक्तियों से शिक्षकों के रिक्त पद भरने पड़े थे।
बीकानेर, जालौर, बांसवाड़ा, जोधुपर, डूंगरपुर, बाड़मेर और मुख्यमंत्री के गृह जिले झालावाड़ की प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्कूलों में बड़ा फेरबदल होने के संकेत मिले हैं। राज्य सरकार के निर्देश पर प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा विभाग में इन सातों जिलों में कार्यरत शिक्षकों की शालावार सूची तैयार की गई है। शहरी क्षेत्र की स्कूलों में जरूरत से अधिक पदस्थापित शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा जा सकता है।
मंगल बिहारी कमेटी की रिपोर्ट लागू नहीं हुई
शिक्षा विभाग ने वर्ष 1997 में समानीकरण के लिए एक नियमावली बनाकर मानदंड निर्धारित किए तथा 1989 में पहली बार समानीकरण हुआ। उस वक्त पूरे राज्य में एक साथ बड़े स्तर पर शिक्षा विभाग में फेरबदल हुआ। वर्ष 2001 में भी पूरे राज्य में एक साथ शिक्षक समानीकरण किया गया।
समानीकरण के विरोध में शिक्षक संघों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट के निर्देश पर राज्य सरकार को एक पूर्व आईएएस अधिकारी मंगल बिहारी की अध्यक्षता में एक समिति गठित करनी पड़ी। इस समिति ने गहन अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी।
समिति ने शाला में कक्षा और कक्ष के आधार पर शिक्षकों को नियुक्त करने का सुझाव दिया था। इसके अलावा भी कई समितियां बनी लेकिन किसी की भी रिपोर्ट व्यावहारिक तौर पर लागू नहीं हो पाई।शिक्षा विभाग अपनी मर्जी के मुताबिक शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों की स्कूलों में शिक्षकों का एडजेस्टमेंट करता आया है। वर्तमान में भी ग्रामीण क्षेत्रों की स्कूलों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं।
अधिकांश शिक्षक शहरी क्षेत्र की स्कूलों में बैठे हैं। अनेक स्कूलें ऐसी हैं, जिनमें छात्र संख्या नहीं के बराबर होने के बावजूद शिक्षक लगाए हुए हैं। राज्य की स्कूलों में छात्र एवं शिक्षकों का अनुपात बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को हमेशा ही स्कूलों में शिक्षक नहीं होने की शिकायत रही है। इस बात को शिक्षाधिकारियों ने भी स्वीकार किया है।