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‘जोधाणो नित रौ भलो’

जोधपुर. jodhpur मैं थार मरुस्थल का स्वर्णिम द्वार विश्व विख्यात जोधपुर हूं। राजनीति की सीमित शब्दावली में मारवाड़ की राजधानी किंतु मेरी सौम्य भाषा, आत्मीय आचरण, शालीन परिधान, गरिष्ठ व्यंजन, शास्त्रीय एवं लोक ललित कलाओं के सम्मोहन से राजस्थान की सभी पूर्व रियासतों के लोग देश विदेश में मारवाड़ी कहलाते हैं।

मैं राजस्थान की संस्कृति का मानक (स्टैंडर्ड) स्वरूप हूं। जोधपुर का नाम लेते ही विश्व के मानस पटल पर भव्य एवं दिव्य संस्कृति की छवि चित्रांकित हो जाती है। उन्नत उत्तुंग मेहरानगढ़ दुर्ग, आंगन में केसरिया बालम पधारो म्हारे देस की स्वर लहरियां।

साढ़े पांच सौ वर्ष पूर्व प्राचीन राजधानी मंडोर को विजित करने की घोर संघर्ष मय प्रक्रिया में राव जोधाजी ने एक जाटनी की कुटिया में थाली के बीच खीच खाने में हाथ जल जाने तथा जाटनी के उपदेश से वर्तमान पचेटिया पहाड़ी पर दुर्ग बनाया गया। (जोधपुर बसाया)

तभी से मैंने अनेक उत्थान पतन के दृश्य देखे हैं। चाहे राजाराम मेघवाल की बलि हो या चिड़ियानाथजी का अभिशाप। दिल्ली के हुमायूं मेरी सीमा से पलायन कर गए। शेरशाह सूरी तो ‘मुट्ठी भर बाजरे के लिए दिल्ली की सल्तनत खोने’ के भय से मेरी सरहद से लौट गए।

महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु के पश्चात औरंगजेब ने मुझ पर कब्जा किया मगर वीर दुर्गादास राठौड़ ने विलक्षण शौर्य से मुझे उन्मुक्त कराया। राजा मानसिंह के समय मैंने फिर पराजय देखी मगर प्रखर शौर्य, अनन्य राष्ट्र भक्ति, मरुभूमि से जन्मी शाश्वत मौलिक संस्कृति के कारण मेरा सतत विकास होता रहा। पर्वत श्रंखलाओं की घाटियों को चीर कर पूरा शहर बसाया गया। दुर्भिक्षों की श्रंखला से बचने दो सौ से अधिक जल स्रोतों का निर्माण किया गया।

सुरक्षित एवं शांतिप्रिय वातावरण वास्तुकला, चित्रकला के साथ विभिन्न लोक एवं कुटीर कलाएं पनपती रहीं। मेरी भाषा मंगलमय हो गई। नये-नये व्यंजनों का आविष्कार हुआ। भक्ति रस की धाराएं उमड़ने लगीं। हथाइयां जमने लगीं। शिक्षा का तीव्र गति से विस्तार हुआ और स्वतंत्रता के लिए व्यापक सत्याग्रह शुरू हुआ।

विश्व के सभी क्षेत्रों में मेरे जोधपुरी मिलेंगे जो आज भी मौलिक संस्कृति से जुड़े हैं। जोधपुर का सामान्य नागरिक भी सिर्फ सामाजिक प्राणी नहीं है। संस्कृति का साधक है। सांप्रदायिक सामंजस्य भाईचारा से आगे रक्त संबंधों जैसा है। पाकिस्तान बना तो सर्वाधिक शांति जोधपुर में रही।

जब 1965 में पाकिस्तान ने दो सौ बम गिराए, 1971 में भी हवाई हमले हुए मगर मैं वीरान नहीं हुआ, अब तो पच्चीस गुणा अधिक बस गया हूं। मेरी चारदीवारी से बाहर दस-दस किलोमीटर तक मकान बनाने की जमीन नहीं रही। मेरे आंगन की सभी जातियां संपन्न और प्रबुद्ध हैं।

मेरी कुछ अपेक्षाएं हैं। यहां तेल शोधक संयंत्र, गैस आधारित विशाल विद्युत उत्पादन केंद्र, केंद्रीय विश्वविद्यालय, मरुस्थल को रोकेने के लिए राष्ट्रीय मरु विकास प्राधिकरण, अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा बने। कभी राणीसर पदमसर ओवर फ्लो होते तो लोग सरिता से जल प्रवाह की पूजा करते। अब सीवरेज लाइन से दलदल उफनता है। नई गटर लाइनें बननी तथा पेयजल के विशाल फिल्टर हाउस बनाने अनिवार्य।

मुझे चारदीवारी के भीतर ‘हेरिटेज सिटी’ घोषित किया जाए, वहां नवनिर्माण न हो, शहर के बाहर बिना भूतल पार्किग के बहुमंजिली इमारतें न बनें। मैं हथाइयों, धींगा गवर व गणगौर मेले का सौम्य उत्सवप्रिय नगर हूं। मुझे भीड़तंत्र में न कुचला जाए। आज भी विदेशी मेरे परिवेश को देख कर चमत्कृत होते हैं। मेरा पर्यावरण न बदला जाए ताकि मैं शताब्दियों तक संस्कृति का तीर्थ रहूं। लोग कहते रहें ‘जोधाणो नित रो भलो।’





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j r gehlot
Monday, 12th May 2008, 19:05
mind blowing,reality & touching to my heart,let it continue
ANIL PUROHIT
Monday, 12th May 2008, 20:58
A very touching article on my city by a person true at heart "Jodhpuri", the author makes me feel proud of my city at the same time make me sad at the new plight and development. Please publish such articles regularly.