कोटा. शहर के मोखापाड़ा-कैथूनीपोल निवासी ओमप्रकाश-कलावती सुमन के पांच वर्षीय बेटे यश को जन्म से ही दोनों आंखों से बिल्कुल दिखाई नहीं देता था। मेडिकल साइंस की भाषा में उसे एम्बलायोपिया था, जिसे लेजी आई यानि सुस्त आंख भी कहा जाता है। दो बरस पूर्व वह खेलते-खेलते छत से गिर गया था, जिससे उसकी दाहिनी आंख का पर्दा हिल गया था, जिसके नतीजन उसे बार-बार निमोनिया होने और सांस की तकलीफ रहने लगी थी।
एक तो तंगहाली और ऊपर से पहली संतान जन्मांध, दोनों ने ओमप्रकाश के परिवार की कमर तोड़ दी। सब्जी बेचकर परिवार चलाने वाले इस दंपती ने अपने पहले बेटे की नेत्र समस्या को कई विशेषज्ञों को दिखाया, कई शिविरों में जांचें कराई, किन्तु कोई नतीजा नहीं निकला।
अलबत्ता, कुछ डॉक्टरों ने उन्हें एम्स, नई दिल्ली ले जाने की सलाह दी। हाल की में इस दंपती ने डॉ. विदुषी पाण्डेय से परामर्श लिया और उपचार कराने में अपनी असमर्थता बताई तो उन्होंने उसका निशुल्क ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के बाद यश की बांयीं आंख की पट्टी खोली गई तो उसने तुरंत अपने परिजनों को पहचान लिया।
पढ़ने के प्रति ललक
एक आंख के ऑपरेशन के बाद यश की दुनिया धीरे-धीरे रोशन होने लगी तो उसने सबसे पहले पढ़ने के प्रति अपनी जिज्ञासा जताई। उसे अब वस्तुओं की पहचान होने लगी है तथा वह आगे बढ़ने की ललक रखने लगा है और कहता है कि पढ़-लिखकर परिजनों का सहारा बनूंगा।
क्या है ‘लेंटीकुलर ऑपेसिटी’ रोग
टोटल मैच्योर लेंटीकुलर ऑपेसिटी नामक रोग आम तौर पर तब होता है, जब आंख का लेंस अपनी पारदर्शिता खो देता है। इसके कारण लेंस सफेद हो जाता है, जिससे दृष्टि खत्म हो जाती है।
>> यश की बांयीं आंख में जन्मजात टोटल मैच्योर लेंटीकुलर ऑपेसिटी नामक रोग पाया गया। दाहिनी आंख में चोट से पर्दा भी हिल चुका था, जिससे उसे दिखाई देना बंद हो गया था। उसकी बांयीं आंख का माइक्रोफेको एस्पीरेशन सिस्टम से ऑपरेशन कर 12 नंबर का अमेरिकन एल्कॉन एक्रिसोफ आईक्यू लेंस प्रत्यारोपित किया गया। उसकी आंख में दुबारा झिल्ली मोटी नहीं हो, इसके लिए पोस्टीरियर केपसुलेक्टोमी एवं एंटीरियर व्रिटेक्टोमी तकनीक का प्रयोग किया गया। इससे उसकी बांयीं आंख की रोशनी लौट आई है।
डॉ. सुरेश पाण्डेय, आई स्पेशलिस्ट