नई दिल्ली. उच्च शिक्षित मुस्लिम महिलाओं के लिए दूल्हा ढूंढ़ना आज भी काफी मुश्किल काम है। सह शिक्षा मुस्लिम महिलाओं को पथभ्रष्ट कर सकती है, लिहाजा उनके लिए धार्मिक शिक्षा और एक अच्छी गृहिणी बनाने के लिए नैतिक शिक्षा देना ही सबसे बेहतर विकल्प है। ये कुछ ऐसी धारणाएं हैं, जिनके कारण भारत में मुस्लिम महिलाएं शिक्षा के मामले में पिछड़ी हुई हैं।
यह तथ्य सरकार समर्थित एक अध्ययन रिपोर्ट में सामने आया है। इसमें मुस्लिम समाज की यह सोच भी उजागर हुई है कि मुस्लिम लड़कियों को युवावस्था से पहले तक ही पढ़ाई करनी चाहिए।
सामान्य कारण : महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मुस्लिम महिलाओं की शैक्षणिक प्रगति की योजना तैयार करने के उद्देश्य से बनाई गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मुस्लिम लड़कियों का उच्च शिक्षा से दूर रहने के सबसे सामान्य कारण उनकी युवावस्था, महिला टीचर की कमी, लड़कियों के लिए अलग स्कूल न होना, परदा प्रथा, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का विरोध, जल्द शादी होना और समाज का विरोधी और दकियानूसी रवैया है।
यहां हालात बदतर : अध्ययन के मुताबिक, स्कूल न जाने वाले 6 से 13 साल के मुस्लिम बच्चों के समूह में 45 फीसदी लड़कियां हैं। राजस्थान, झारखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा में मुस्लिम लड़कियों की साक्षरता का स्तर सबसे खराब है। दक्षिणी राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है और शायद इसकी वजह वहां तकनीकी और व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थानों का अधिक होना है।
तो दूल्हा नहीं मिलेगा : मुस्लिम लड़कियों के उच्च शिक्षित न होने की एक अहम वजह मुस्लिम समाज की यह सोच भी है कि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की को योग्य वर नहीं मिलेगा। उनका मानना है कि गरीबी और सरकारी नौकरी के प्रति अलग सोच की वजह से गिने-चुने मुस्लिम लड़के ही उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। अध्ययन के अनुसार, सिर्फ 12.5 फीसदी मुस्लिम ही सह शिक्षा के पक्ष में हैं।