नदी घाटी परियोजनाओं के निर्माण का सर्वाधिक संवेदनशील पक्ष है परियोजना जलाशयों की डूब से प्रभावित आबादी का पुनर्वास। गुजरात में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर और मध्यप्रदेश में इंदिरा सागर तथा ओंकारेश्वर परियोजनाओं से प्रदेश के लगभग 83 हजार परिवारों का विस्थापन हुआ है।
केंद्र सरकार द्वारा गठित नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने वर्ष 1979 में दिए अपने निर्णय में कहा था कि जिन किसानों की 25 प्रतिशत से अधिक जमीन परियोजना जलाशयों की डूब में आ रही है सरकार उन्हें बदले में खेती की जमीनें मुहैया कराए। न्यायाधिकरण का यह मत उस विचार से जन्मा था कि खेती से अपनी आजीविका चलाने वाले किसान की भरपाई खेती ही कर सकेगी।
बीते 28 सालों में औद्योगिक और शहरी विकास की अभूतपूर्व आंधी ने समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। 90 के दशक में पुनर्वास पर मैदानी काम में गति आई, तब यह अनुभव हुआ कि जमीन के बदले जमीन देने की बात आज सरकार के लिए जितनी कठिन है, उतनी ही किसानों के लिए भी रुचिकर नहीं है।
सरदार सरोवर परियोजना में प्रदेश की लगभग 2500 हेक्टेयर ऐसी कृषि भूमि अधिग्रहीत हुई जिसमें जमीन के बदले जमीन दी जानी थी। बाद में परिवार के वयस्क पुत्रों को भी न्यूनतम दो हेक्टेयर जमीन अलग से देने का प्रावधान सम्मिलित हुआ। इंदिरा सागर परियोजना में अधिग्रहीत 24 हजार 886 हेक्टेयर कृषि भूमि और ओंकारेश्वर परियोजना में अधिग्रहीत 2530 हेक्टेयर जमीन के बदले जमीन देने की स्थिति निर्मित हुई।
इस प्रकार तीनों परियोजना प्रभावित किसानों को 30 से 40 हजार हेक्टेयर सिंचित कृषि जमीन देना तकरीबन असंभव था। कमांड क्षेत्र में इतना रकबा अधिग्रहीत कर विस्थापित किसानों को देने का सीधा मतलब था हजारों दूसरे किसानों को भूमिहीन कर असंतोष को जन्म देना।
एक ओर जहां सरकार के सामने कठिनाई थी वहीं किसानों की भी अपनी प्राथमिकताएं थीं। जमीन के बदले जमीन लेने के प्रावधानों की पड़ताल करने पर हम किसान की प्रतिक्रिया का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। जमीन लेने के लिए डूब जमीन की मुआवजा राशि का 50 प्रतिशत सरकार को भूमि मूल्य मद में जमा कराना होता है। शेष मूल्य किसान के नाम कर्ज के रूप में दर्ज होगा।
कर्ज राशि किसान से ब्याज रहित किस्तों में 20 वर्ष अवधि में वसूल की जाएगी और इस कर्ज की गारंटी के रूप में दी गई जमीन सरकार के पास 20 वर्ष तक बंधक रहेगी। सबसे असुविधाजनक यह कि विस्थापित किसान को जमीन उस स्थान में दी जाएगी, जहां जमीन उपलब्ध होगी।
किसान की मन:स्थिति से सोचें तो यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया आएगी कि आधी मुआवजा राशि सरकार के पास जमा कराने, अपने मूल निवास से दूर जमीन लेने, उसे बंधक रखने और 20 वर्ष तक कर्ज की किस्त चुकाने से बेहतर होगा सरकार से मुआवजा राशि और अतिरिक्त राशि लेकर खुद अपनी जरूरत अपनी पसंद और सुविधा के स्थान पर जमीन खरीदना।
यहां अंधे और लंगड़े की कहानी चरितार्थ होती है। दोनों मेले जाना चाहते थे। उन्होंने सुविधाजनक विकल्प चुना-लंगड़ा अंधे के कंधे पर बैठा। लंगड़ा राह बताता रहा, अंधा चलता रहा। इस तरह दोनों मेले में पहुंच गए। इस मामले में सरकार और विस्थापित किसानों के बीच ऐसा ही समाधान सतह पर आया। सरकार ने विशेष पैकेज राशि की पेशकश इस अतिरिक्त लाभ के साथ दी कि विस्थापित द्वारा जमीन खरीदने पर स्टांप व रजिस्ट्रेशन शुल्क माफ रहेगा।
किसानों ने इसे हाथों हाथ लिया। एक की समस्या दूसरे पक्ष का समाधान साबित हुई। सरदार सरोवर परियोजना में 95 प्रतिशत किसानों ने विशेष पैकेज स्वीकार कर लिया। इंदिरा सागर परियोजना में शत-प्रतिशत किसानों ने विशेष धन राशि लेना स्वीकार किया। ओंकारेश्वर परियोजना में भी यही स्थिति बनी। सरकार द्वारा जमीन के बदले जमीन देने के लिए बनाए लैंडबैंक में विभिन्न जिलों में लगभग पांच हजार हेक्टेयर भूमि लेने में किसानों ने बहुत कम रुचि दिखाई।
इसका एक पक्ष यह भी है कि घाटे का सौदा बनती जा रही खेती को छोड़ कई किसान अन्य व्यवसाय अपनाना चाहते हैं। जमीन के बदले जमीन लेने की अनिवार्यता परिवर्तन का विकल्प नहीं देती, जबकि नकद राशि किसान को फ्रीहैंड स्थितियां सुलभ कराती हैं। किसान फ्रीहैंड चाहता है। सरदार सरोवर परियोजना में कई किसानों द्वारा कृषि खरीद के फर्जी दस्तावेज पेश करना भी यही साबित करता है।
जमीन के बदले जमीन लेने के आकर्षक और बहुप्रचारित नारे की जमीनी हकीकत से रूबरू होकर ही विस्थापित किसानों की मदद की जा सकती है। जरूरत इस बात की है कि विस्थापितों को मिले मुआवजे और विशेष पैकेज की राशि के प्रभाव से जमीनों की कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ने की स्थिति पर नियंत्रण रखते हुए किसान को अपनी इच्छानुसार पसंद की जमीन खरीदने में जरूरी मार्गदर्शन और सलाह की व्यवस्था की जाए।