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कश्मीर पर नई सोच का इशारा!

दृष्टिकोण. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सह अध्यक्ष आसिफ अली जरदारी द्वारा कश्मीर मसले पर दिए गए हालिया बयान पर पाकिस्तान में बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं झलकता है। ऐसा लगता है कि वहां के प्रभावशाली तंत्र में उनके बयान को या तो हल्के में लिया गया या उसे एक ‘निहित स्वार्थ’ के तहत की गई एक प्रतिक्रिया ही माना गया है।

किसी भी प्रकार के निहित स्वार्थ के पीछे भागने की परंपरा पाकिस्तान में नई नहीं है। साठ के दशक में भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारी अपनी अनौपचारिक बातचीत में यह कहते थे कि कश्मीर समस्या सुलझाना बहुत आसान है, बशर्ते दोनों देश इस पर अपना ध्यान तो दें। लेकिन राजशाही की मजबूरियों के तहत कश्मीर समेत अन्य मुद्दों और नजरियों को अलग तरह से इस्तेमाल किया गया।

जरदारी का बयान भी इसी तरह की सचाई का एक नमूना है। साठ सालों में कश्मीर मसला बहुत पेचीदा हो गया है और इस नजरिए से जरदारी के बयान को राजनीतिक तौर पर एक अपरिपक्व व्यक्ति का बयान कहा जा सकता है।

लेकिन सचाई यह है कि यह बयान एक ऐसे शख्स का भी है जो तिजारत का मोल समझता है। जरदारी के बयान के पीछे की हकीकत को समझने की कोशिश करें तो ऐसा लगता है कि वो सिर्फ एक बिजनेसमैन की तरह बोल रहे थे। उनका मतलब कुछ ऐसा था- हालांकि ये शब्द मेरे हैं- ‘मैं एक बिजनेसमैन हूं और मैं सरहदों के पार चीजों के व्यापार मसला खूब समझता हूं। हिंदुस्तान मेरे लिए एक बहुत बड़ा बाजार है तो क्यों न हम कश्मीर पर झगड़ने जैसे मसलों को आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ दें, क्योंकि वो आज के नफे के सौदे में फिट नहीं होते हैं?’

और बाद में क्या होगा? इसके जवाब में वो कुछ ऐसा कहना चाहते हैं- ‘वे हम देखेंगे। चीजें वैसे नहीं बिगड़ेंगी जैसे अमेरिकी और यूरोपीय सोचते हैं। आखिरकार हम हथियारों की दौड़ और नाभिकीय होड़ के मामले में उनसे कम समझदार तो नहीं हैं..’

और मुझे लगता है कि जरदारी के बयान को इसके मद्देनजर समझना चाहिए कि वे खुद एक बिजनेसमैन और नौसिखिया राजनेता हैं। इस पर पाकिस्तान में जिस तरह की प्रतिक्रिया हुई उससे ऐसा दिखता है कि यह प्रतिक्रिया जरदारी के हालिया वक्तव्य पर न होकर साठ साल के कुशासन, भ्रमित राजनीति और नैतिक जिम्मेदारी के अभाव पर थी। हालांकि वक्तव्य के समय और उस पर मिश्रित प्रतिक्रिया को देखते हुए यह भी लगता है कि कश्मीर की अवाम की नई दिल्ली के साथ-साथ इस्लामाबाद के प्रति भी अविश्वास की खाई और भी चौड़ी हो सकती है।

हालांकि जरदारी के बयान का एक सकारात्मक पहलू भी है। वह यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्तों को कश्मीर समस्या के नाम पर बंधक नहीं बनाया जा सकता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि दोनों ही देश परस्पर शत्रुता के स्थायी तनाव के साथ नहीं रह सकते हैं। लगभग छह वर्ष पूर्व ही दोनों देशों में यह सहमति बन चुकी है कि कश्मीर समस्या दोनों ही देशों को आगे बढ़ने से रोके हुए है। अत: इसका समाधान होना ही चाहिए, वह भी दोनों देशों की संप्रभुत्ता को नुकसान पहुंचाए बगैर।

पाकिस्तान का एक तबका मानता है कि कश्मीर समस्या पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों पर भारी पड़ रही है और उसकी अपनी सुरक्षा के लिए ही खतरा बन रही है। मैं यहां एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि यदि भारत और पाकिस्तान मित्रवत रहना चाहते हैं तो कश्मीर के लिए किसी भी लिहाज से कोई बुरी खबर नहीं है। यहां जरदारी के बयान पर भारत की ओर से किसी प्रतिक्रिया का न आना भी एक निहितार्थ रखता है। यह बताता है कि भारत काफी हद तक आश्वस्त और विश्वास से परिपूर्ण है। ऐसा क्यों?

क्योंकि शाइनिंग इंडिया का नारा उसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था ही नहीं, वरन एशियाई शक्ति के तौर पर भी एक अलग पहचान दे रहा है। ऐसे में दिल्ली की चुप्पी के पीछे मुझे लगता है कि कहीं न कहीं दक्षिण एशिया में अमेरिका की उपस्थिति का भी अहसास है। अमेरिका क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की नीति पर चल रहा है। बदले में वह संबंधित क्षेत्र में अपने हितों की पूर्ति चाहता है। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में उसने इसी नीति के तहत भारत को अपने प्रमुख सहयोगी के रूप में चुना है। इसका संकेत हाल ही में निकोलस बर्न्‍स भी अपने एक लेख के जरिये दे चुके हैं।

अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रख अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और संभवत: बर्मा पर भी निगाह रख सकता है। फिर चीन तो है ही। बर्न्‍स के लेख से इस बात के भी संकेत मिलते हैं कि चीन की बढ़ती शक्ति के लिहाज से क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका उल्लेखनीय हो जाती है। ऐसे में अमेरिका से संबंध भारत के लिए भी मुफीद हैं। यही वे चंद वजह हैं जिनके कारण भारत ने राजनीतिक तौर पर एक अपरिपक्व व्यक्ति के बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर करना उचित नहीं समझा।

जरदारी के बयान पर नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से हालांकि एक स्पष्ट बात यह भी सामने आती है कि कश्मीरी अवाम इसका स्थायी समाधान चाहती है। जैसा कि मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा भी है कि हम कश्मीर को दरकिनार नहीं कर सकते हैं, जैसा कि पहले कई मौकों पर होता आया है। माना जाता रहा है कि स्थानीय लोगों की भावनाओं को दरकिनार करने से ही समस्या इतनी विकराल हुई है।

यद्यपि जरदारी का बयान वैश्वीकरण की दिशा में पाकिस्तान को आगे बढ़ाने का भी द्योतक है। फिर भी कह सकते हैं कि जरदारी कश्मीर और उससे जुड़ी समस्या को दस फीसदी ही समझ सके हैं और बाकी भी वे जल्द ही समझ लेंगे।

-लेखक इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, कश्मीर के वाइस चांसलर हैं।





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