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कारगर व्यवस्था की दरकार

संपादकीय. भारतीय न्याय व्यवस्था इन दिनों जितनी चर्चा में है, उतनी पहले कभी नहीं रही। सस्ता व सुलभ न्याय के लक्ष्य को पाने में आने वाली दिक्कतों को लेकर न्याय प्रणाली में तब्दीली के साथ ही शिकवा-शिकायतों का दौर भी चल पड़ा है। यह बात तो लगभग हर वर्ग स्वीकारने लगा है कि सामाजिक बदलाव तथा लोकतंत्र की मजबूती में इस महत्वपूर्ण स्तंभ की भूमिका पूरी तरह सार्थक नहीं बन पाई है।

सुप्रीम कोर्ट के जज पी. सतशिवम जब अपने व्याख्यान में आधी सदी पहले जवाहरलाल नेहरू की इस टिप्पणी को याद करते हैं कि न्याय प्रणाली जंग लगी हुई और पुरानी शैली की है, तो प्रकारांतर से यही स्वीकारोक्ति उभरती है कि देश की न्याय व्यवस्था आजादी के छह दशक बाद भी कारगर साबित नहीं हो रही है। न्याय प्रणाली में कई तरह के प्रयोग पिछले सालों में किए गए, लेकिन उनका वांछित सकारात्मक परिणाम नहीं उभर सका।

लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की तुलना में न्यायपालिका के प्रति लोगों में आदर और विश्वास अधिक है, लेकिन चुनौती यह बन गई है कि यह विश्वास कमजोर न होने पाए। इसकी मुख्य वजह न्याय का महंगा और विलंबित होना है। निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लंबित प्रकरणों का अंबार लगा हुआ है जो आम आदमी के साथ ही सरकार व न्यायपालिका की चिंता का सबब है।

पिछले दिनों राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने भी अपनी चिंता को सार्वजनिक अभिव्यक्ति दी थी। हाल ही में न्यायाधीशों के सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में होने न होने पर भी बहस हुई। इन सारी बहस और चर्चाओं के बीच आम आदमी के लिए न्याय की सर्वसुलभता का सवाल कहीं दबा रह जाता है।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हर स्तर पर निराश किसी व्यक्ति के पास न्यायपालिका से ही न्याय मिलने का विकल्प शेष रहता है। न्यायपालिका की जिम्मेदारी शीघ्र न्याय देने भर तक सीमित नहीं है अलबत्ता न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के साथ लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का दायित्व भी उस पर होता है। आवश्यकता इस बात की है कि टीका-टिप्पणियों से ऊपर उठकर न्याय व्यवस्था को कारगर बनाने की पहल की जाए। इसमें न्यायप्रक्रिया में लगी सभी एजेंसियों को सक्षम बनाना जरूरी है, तभी न्यायपालिका की न्याय देने की शक्ति मजबूत होगी।





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