विकास मंत्रयह लगभग 12 साल पुरानी किंतु हमेशा ताजा रहने वाली बात है। तब मैंने एक जरूरी काम से श्री केके बिड़लाजी से समय चाहने के लिए उन्हें फोन किया था। उन्होंने कहा ‘पांच बजे आ जाओ।’ इससे पहले कि इस सफलता की उत्तेजना से असंतुलित हो मैं फोन का रिसीवर रखता, उधर से आई आवाज ने मुझे चौंका दिया, ‘डॉ. अग्रवाल क्या आप जानते हैं कि पांच बजे का मतलब क्या होता है?’
पता नहीं किस ईश्वरीय प्रेरणा ने उस समय मेरे मुंह से यह उत्तर कहलवाया ‘यस सर, मैं जानता हूं कि पांच बजे का मतलब होता है चार बजकर उनसठ मिनट और साठ सैकंड।’ उन्होंने ‘आ जाओ’ कहकर फोन रख दिया। मैं समझ गया कि वहां मैं जिस काम से जा रहा हूं वह काम हो जाएगा, बशर्ते मैं सही समय पर पहुंच जाऊं। मैं वहां सही समय पर पहुंचा और वही हुआ जिसकी मैं उम्मीद लगाए हुए था।
इस छोटी सी किंतु बड़ी घटना ने मेरी चेतना में इस सत्य का बीज डाल दिया कि समय केवल समय भर नहीं होता बल्कि इससे कहीं अधिक यह हमारा चरित्र होता है, हमारी साख होती है। यह अनुशासन के प्रति हमारे सम्मान की भावना तथा इन सबसे अधिक अपने द्वारा दूसरे को दिए गए वचन के प्रति हमारी वफादारी का प्रमाण होता है।
सोचकर देखिए कि यदि मैं अपने ही द्वारा दिए गए समय संबंधी वायदे को निभाने में झूठा सिद्ध हो रहा हूं, तो दूसरों को मेरे द्वारा कही गई ढेर सारी बातों तथा किए गए ढेर सारे वायदों पर यकीन क्यों करना चाहिए। वास्तव में देरी से पहुंचकर हम सामने वाले का न केवल अपमान करते हैं बल्कि वहां जाने से होने वाले अपने लाभ को भी आधा कर देते हैं। दुर्भाग्य यह है कि ये दोनों हमें साफ तौर पर दिखाई नहीं देते।
-लेखक समय एवं जीवन प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं।