हाल में केतन पारीख को 47 करोड़ रुपए के बैंक घोटाले में एक वर्ष कैद की सजा सुनाई गई है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आज भी ताकतवर लोग कानून के शिकंजे से बिना दंडित हुए या मामूली दंड पाकर निकल जाते हैं। दुर्भाग्य से इस पर मीडिया में कोई चर्चा नहीं हुई। केतन पारीख को मिली मामूली सजा हमारे पूरे अपराध न्याय प्रशासन पर सोचने को विवश करती है।
किसी भी सरकार और नागरिक समाज का अंतिम लक्ष्य है न्याय प्राप्त करना। हर इंसान की सबसे बड़ी भूख होती है न्याय पाना इसलिए हमारे धर्मशास्त्रों में न्याय को धर्म के बराबर स्थान दिया गया है। इसका एक अभिन्न पहलू यह है कि यह अंधा होता है जो फर्क नहीं करता है और कानून सब पर एक समान लागू होता है। केतन पारीख, हितेन दलाल एवं अन्य अभियुक्तों ने बैंक से 47 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी कर उसे शेयरो में निवेश कर दिया।
इन दो अभियुक्तों को एक-एक वर्ष तथा एक अन्य को उसका बुढ़ापा देखते हुए 6 महीने की कैद की सजा मुंबई की एक विशेष अदालत द्वारा दी गई है। जिन धाराओं के तहत इन्हें सजा दी गई उनमें न्यूनतम सजा का जिक्र नहीं है जबकि धारा 403 एवं 420 के तहत अधिकतम सजा क्रमश: 3 वर्ष और सात वर्ष का कारावास एवं जुर्माना है। जितने आपराधिक घोटाले होते हैं उन सबमें विश्वासघात तथा धोखाधड़ी होती ही है लेकिन चूंकि न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है इसलिए ज्यादा से ज्यादा एक वर्ष की सजा अभियुक्तों को दी गई है।
अब इस फैसले की तुलना उच्चतम न्यायालय के उन निर्णयों से करें जिनमें प्रबंधन को अधिकार दिया गया है कि यदि कोई श्रमिक 10 रुपए की भी गड़बड़ी करे, तो उसे सेवा से हटाया जा सकता है क्योंकि उसने प्रबंधन का विश्वास खो दिया है। दो मामलों श्रीरंगई एवं मारगातम से प्रमाणित हो जाता है कि हमारा अपराध न्याय प्रशासन गरीबों के प्रति कितना निष्ठुर है। श्रीरंगई मामले में अभियुक्त एक महिला है जो दुर्भाग्य एवं दरिद्रता की व्यथा-कथा है।
पति ने उसे छोड़ दिया है और अपने एवं पांच बच्चों की परवरिश के लिए उसने कमाई के लिए हरसंभव प्रयत्न किया। आशा की कोई किरण न देख उसने सभी पांचों बच्चों को कुएं में फेंककर मार डाला और अंत में स्वयं भी उसमें कूद पड़ी। परंतु दुर्भाग्य ने यहां भी उसका साथ नहीं छोड़ा। उसे किसी राहगीर ने बचा लिया और उसे पांच बच्चों की हत्या एवं आत्महत्या करने की कोशिश के मामले में दंडित किया गया।
उच्च न्यायालय ने इस अपराध के लिए गरीबी को आधार मानने से इनकार कर दिया। इसी तरह मारगातम में अभियुक्त पति-पत्नी कोई काम या दान न पाने के कारण करीब 10 दिन भूखे रहे। हताशा में वे दोनों स्वयं को डेढ़ माह के अपने बच्चे के साथ बांधकर कुएं में कूद गए। यहां भी दुर्भाग्य का खेल कुछ ऐसा ही रहा कि बच्चा तो फिसलकर मर गया परंतु दंपति को मुसाफिरों ने बचा लिया। उन्हें भी बच्चे की हत्या की कोशिश एवं आत्महत्या की कोशिश के मामले में दंड मिला। हैरानी होती है कि राज्य जीवन के मौलिक अधिकार की सुरक्षा नहीं करता, उन्हें रोजगार नहीं देता और फिर भी उन्हें अपनी या अपने बच्चों की जीवनलीला समाप्त करने या इसका प्रयास करने के लिए सजा देता है। भुखमरी से राज्य के विवेक को धक्का नहीं लगता है जबकि मौत तक की दुखदायी यात्रा को छोटा करना दंडनीय है।
कानूनों को लागू करने के तरीके भी भेदभावपूर्ण हैं। लोकतंत्र समानता के सिद्धांत पर आधारित है परंतु पहुंच वाले लोगों के पक्ष में अपवाद इसका मखौल उड़ाते हैं। मानवाधिकार की विश्वव्यापी घोषणा में कानून के शासन की व्याख्या है जो तीन उदात्त सिद्धांतों पर आधारित है कोई कानून से ऊपर नहीं है (धारा 7) सभी कानून के समान संरक्षण के हकदार हैं। हर व्यक्ति को संविधान या कानून द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के हनन के लिए प्रभावी उपचार का अधिकार है (धारा 8)।
अंग्रेज भारतीयों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते थे। एक भारतीय को तीन सप्ताह के सश्रम कारावास की सजा हुई, क्योंकि उसने एक अंग्रेज के कुछ कुत्तों द्वारा हमले करने पर अपने आपको बचाया। इतना अन्याय और अपमान झेलने के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने इंसाफ को सर्वोच्च स्थान देते हुए समानता के अधिकार को सबसे मौलिक अधिकार बनाया।
इसकी रक्षा के लिए न्यायपालिका को पूरी तरह स्वतंत्र बनाया गया। केंद्र एवं राज्यों द्वारा बनाए गए कई कानूनों को न्यायपालिका ने इसलिए निरस्त कर दिया क्योंकि वे कानून के समक्ष समानता के अधिकार का हनन करते थे। परंतु कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मामले में अदालतों के निर्णय ऐसे होते हैं जिन्हें तर्को के आधार पर समझना मुश्किल है।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।