पाकिस्तान की लगभग डेढ़ माह पुरानी यूसुफ रजा गिलानी की साझा सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग के सभी नौ मंत्री सरकार से बाहर आ गए हैं। शरीफ साहब को शिकायत है कि बर्खास्त जजों की बहाली के मुद्दे पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली जरदारी वादाखिलाफी कर रहे हैं। सरकार बनाते समय यह कहा गया था कि नवंबर 2007 में आपातकाल लगाने को अवैध बताने वाले जिन 60 जजों को राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने बर्खास्त कर दिया था, उन्हें एक महीने के अंदर बहाल कर दिया जाएगा। लेकिन जजों को नजरबंदी से मुक्ति देने के अलावा सरकार उनकी बहाली की हद तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बर्खास्त जजों की जगह पर मुशर्रफ ने अपने जिन कठपुतली जजों को नियुक्त किया था और जिनके जरिये देश में आपातकाल लगाए जाने से लेकर जरदारी और बेनजीर के ऊपर चल रहे भ्रष्टाचार के मुकदमों की माफी तक का औचित्य सिद्ध कराया था, नवाज शरीफ उन्हें भी हटाने की मांग कर रहे थे।
जजों की बर्खास्तगी और वकीलों के आंदोलन ने पाकिस्तान में मुशर्रफ की हुकूमत के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह चुनाव का एक बड़ा मुद्दा था और कई राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को आधार बना कर चुनाव का बहिष्कार तक किया था। ऐसे में जरदारी को यह भरोसा भी था कि पंजाब प्रांत में नवाज शरीफ की पार्टी की सरकार उनकी पार्टी के समर्थन पर टिकी हुई है इसीलिए मियां साहब उनकी केंद्र की सरकार से समर्थन वापस लेने का जोखिम नहीं उठाएंगे। शायद इसीलिए सीधे समर्थन वापसी की बजाय शरीफ ने सरकार को बाहर से मुद्दा आधारित समर्थन देने का पेचीदा रास्ता अख्तियार किया।
जो भी हो, मुश्किल से बनी साझा सरकार की इस फजीहत से पाकिस्तान के नवजात लोकतंत्र की दरारें साफ-साफ दिखने लगी हैं। वैसे भी शरीफ और जरदारी की पार्टियां एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं, उनके राजनीतिक हित अलग-अलग हैं। मुशर्रफ के प्रशासन में अस्तित्व के संकट से जूझती हुई ये पार्टियां सहयोगी भूमिका में साथ-साथ आई थीं।
इसलिए जैसे ही तानाशाही का डर कम हुआ इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं उभरने लगीं, लेकिन इस चक्कर में ये राजनीतिक पार्टियां यह भूल गईं कि उनके निहायत खुदगर्ज रवैये से राजनीतिक विश्वसनीयता का कितना भारी क्षरण हुआ है। यह महज संयोग नहीं है कि बार-बार लोकतंत्र को मौका देने और इसके निकम्मे और भ्रष्ट झंडाबरदारों द्वारा लगातार छले जाने पर विवश होकर पाकिस्तानी जनता तानाशाही हुकूमतों में सुकून खोजती रही है। इसलिए लोकतंत्र के बड़े और सामाजिक स्वार्थ के मद्देनजर शरीफ और जरदारी को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ फिलहाल स्थगित रखने चाहिए।