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भाजपाइयों के नहले पर बादल का दहला

जालंधर. ‘मैं अटल जी, अडवानी जी ते भाजपा नूं नईं छड सकदा। जेकर तुसी एही गल करनी ऐ ते पहलां मेरा इस्तीफा अटल जी, अडवानी जी दे कोल ले जाओ ते मेरी थां ते उन्हां दी मर्जी नाल नवां नेता चुन लो। असीं इक परिवार हां।’ यह बात मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सरकार से इस्तीफा देने आए भाजपा कोटे के मंत्रियों से कही।

भाजपा प्रभारी बलबीर पुंज और प्रदेश भाजपा प्रधान राजिंदर भंडारी, स्थानीय निकाय मंत्री मनोरजन कालिया भाजपा मंत्रियों एवं विधायकों के साथ इस्तीफा देने के लिए जैसे ही बादल के कक्ष में दाखिल हुए, बादल ने सतश्री अकाल कहते हुए पहले अपना ही इस्तीफा उन लोगों को थमा दिया।

बादल के इस रुख को देख भाजपा नेता चौंक गए। फिर बादल ने उन्हें अपने पास बिठाकर गिले-शिकवे सुने। सबसे पहले भाजपा विधायक अनिल जोशी, उसके बाद सीताराम कश्यप, अमरजीत सिंह साही और फिर भाजपा महासचिव कमल शर्मा ने अपनी शिकायतें रखीं।

आगे के समीकरण एवं संभावनाएं
इस प्रकरण के बाद भाजपा गांवों में अपना आधार बढ़ने में पूरी ताकत लगाएगी और अपने सिख एजैंडे को पूरी तरह से लागू करने की कोशिश करेगी। मालवा उसके निशाने पर है और डेरे से समर्थन मिलने से यहां नए समीकरण बनेंगे। इससे अकाली दल का गढ़ कमजोर होगा। प्रबल संभावना है कि इस समीकरण के बल पर भाजपा आने वाले आम चुनाव में मालवा से एक सीट की मांग करेगी।

इससे पहले दलित-बहुल दोआबा में भाजपा दलित समुदाय को अपने साथ जोड़ने में सफल रही थी। सिख समुदाय को अपने साथ जोड़कर वह मालवा में भी आधार बनाने का प्रयास करेगी। यह भी संभावना है 26 मई को होने जा रहे पंचायत चुनाव में भी भाजपा इस क्षेत्र में उम्मीदवार उतारेगी।

दूसरी ओर, अकाली दल में भाजपा-विरोधी गुट फिर सक्रिय हो गया है। यह गुट अकाली नेतृत्व को उदारवादी रवैया छोड़कर एक बार फिर पंथक कार्ड खेलने को प्रोत्साहित करेगा। इससे अकाली दल में नए समीकरण बनेंगे। काफी समय से हाशिए पर रहे इस गुट का तर्क है कि भाजपा को गांवों में फैलने से रोकने के लिए अकाली दल को अपने पुराने रूप में आ जाना चाहिए।

किसे फायदा, किसे नुकसान, कांग्रेस उठा सकती है फायदा
इस प्रकरण से सबसे ज्यादा राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है। मर्जी के अफसरों की तैनाती से भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा। इससे सबसे ज्यादा नुकसान अकाली दल प्रधान सुखबीर बादल को होगा। सुखबीर से भाजपा खासी नाराज है। इस चुनाव में सुखबीर के चहेते समझे जाने वाले नेताओं ने भाजपा नेताओं का विरोध किया था। भाजपा आने वाले समय में सुखबीर को मुख्यमंत्री बनाने पर आसानी से सहमति नहीं देगी।

गठजोड़ में पैदा हुई दरार का लाभ कांग्रेस इन चुनावों मे उठा सकती थी, पर अपनी गुटबाजी में फंसी कांग्रेस ने चुनावों में यह मौका गंवा दिया। अब वह जनता के सामने अब भी इस मुद्दे को तूल देकर गठजोड़ की छवि खराब करने का प्रयास कर सकती है।

इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार
संबंधों में आई खटास के लिए भाजपा सुखबीर को जिम्मेदार मान रही है। वैसे वह काफी समय से सुखबीर की कार्यप्रणाली से नाराज थी। भाजपा को सुखबीर के शहरी एजैंडे और अपने मंत्रियों के विभागों में दखल पर ऐतराज था।

जिला परिषद और ब्लॉक समितियों की सीटों में तालमेल पर बातचीत करने का आग्रह भाजपा कई बार सुखबीर से कर चुकी थी। भाजपा को लग रहा था कि उसकी उपेक्षा हो रही है। जब मामला बढ़ गया तो अकाली दल ने बात करने का प्रयास किया, लेकिन तब तक भाजपा अपने उम्मीदवार मैदान में उतार चुकी थी।

अब क्या होगा
भाजपा अब सरकार पर हावी होने का प्रयास करेगी। बादल को आगे सभी नीतिगत फैसले भाजपा की सहमति से करने पड़ सकते हैं। भाजपा पुलिस एवं प्रशासन के तबादलों में पूरा हस्तक्षेप करेगी और अपने चहेते अफसरों को मलाईदार पदों पर लगवाएगी। भाजपा ने इन अफसरों की सूची पहले ही तैयार कर रखी है। भाजपा विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यो के लिए सरकार को फंड जारी करने होंगे।





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