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‘क्रिकेट को कर दिया सस्ता’

चंडीगढ़बिजनेस टाइकून की साख दांव पर है, एक्ट्रेस की खुशी छुपाए नहीं छुपती, सुपर स्टार की स्मोकिंग बढ़ती जा रही है, आईपीएल ने क्या बना डाला है सबको? इनके अलावा वे हिडन बिजनेसमैन जो इसमें इन्वॉल्व हैं, उनकी परेशानी यह है कि न तो वे अपनी फिक्र का खुलकर इजहार कर पा रहे हैं और न ही इससे बेफिक्र होकर, खेल का आनंद ले पा रहे हैं। देशभर में इस वक्त माहौल आईपीएलमय हो चुका है, लेकिन इसके बीच क्या हालत है असली क्रिकेट की और इससे क्या फर्क पड़ रहा है खिलाड़ियों की साइकोलॉजी पर, बता रहे हैं प्रोफेसर जितेंद्र मोहन। वे एशियन एसोसिएशन ऑफ एप्लाइड साइकोलॉजी के प्रेजिडेंट होने के साथ पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमरिटस और जाने-माने स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट हैं।

क्रिकेट प्लेग्राउंड से गायब हो जाएगा। वह दिखेगा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्ज की मीटिंग्स में, बैलेंस शीट्स में या फिर बॉलीवुड की पार्टीÊा में। खिलाड़ियों की डिजाइनर ड्रेसेज, उनका लाइफ स्टाइल और एन्डोर्समेंट पहले ही कम नहीं थे इस खेल को नुकसान पहुंचाने के लिए कि अब इसे पूरी तरह कमर्शियलाइज भी कर दिया गया है। ऐसा लग रहा है जैसे क्रिकेट उठकर वाजिद अली शाह के दरबार में चला गया हो, जो बढ़िया डांस करेगा वाहवाही उसी के हिस्से मंे जाएगी....कह रहे हैं प्रोफेसर जितेंद्र मोहन।

1975 में हॉकी की जिस टीम ने वर्ल्ड कप जीता था उसे साइकोलॉजिकली मजबूत बनाने की ट्रेनिंग इन्होंने दी थी। वे सीधे तौर पर आज के क्रिकेट को क्रिकेट विरोधी बताते हैं। टैस्ट मैच से वन डे और अब 20-20 तक आते-आते क्रिकेट इतना इंस्टैंट हो गया है कि टू मिनट्स नूडल्स जैसा नतीजा चाहते हैं देखने वाले। और सिर्फ देखने वाले ही क्यों वे सारे मालिकान जिन्होंने क्रिकेट खिलाने की कंपनियां शुरू की हैं, ऐसे ही नतीजे चाह रहे हैं तभी तो विजय माल्या का मलाल रह-रहकर उबल रहा है। प्रोफेसर मोहन कहते हैं, एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर मैं जानता हूं कि टीम में खेलने के लिए टीम भावना कितनी जरूरी है, लेकिन आज के क्रिकेट में मामला सिर्फ व्यक्तिगत होकर रह गया है। चारू शर्मा या द्रविड़ के साथ जो व्यवहार हो रहा है वह इसी सोच के कारण है। माल्या सीधे तौर पर उन्हें हार के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

क्रिकेट का कमर्शियलाइजेशन आज से नहीं, बल्कि काफी पहले से हो रहा है। ऐसे में नए लोगो के इसमें शामिल हो जाने से प्लेयर्स की साइकोलॉजी कैसे प्रभावित हुई? प्रोफेसर मोहन का मानना है-खेल पहले से चल रहा था, इसमें पैसा भी पहले से जुड़ा था, लेकिन एक दिन अचानक कुछ बड़े लोगों को समझ आ गया कि यह फायदे का सौदा है, और ऐसे में देखने वाला और वे खुद क्रिकेट को सिर्फ एक खरीदार और कंज्यूमर की नजर से देख रहे हैं। यही वजह है कि प्लेयर्स को जब मालिकान की डांट पड़ती है तो वे कहते हैं, वे मालिक हैं तो क्यों नहीं बोलेंगे। इसमें क्रिकेट कहां नजर आ रहा है।

प्रोफेसर मोहन हरभजन के थप्पड़, दोस्ती में दरार और प्लेयर्स के साथ होने वाले सारे बर्ताव के पीछे कमी महसूस कर रहे हैं टीमों को न दी जाने वाली साइकोलॉलिजक मदद की। उनका कहना है कि जिस तेजी से क्रिकेट का सीन बदला है उस अनुपात में खिलाड़ियों की साइकी भी बदली है। ऐसे में उनकी आक्रामकता, उनके असंतुलित व्यवहार और टू-मच क्रिकेट से कोप-प करने के लिए साइकोलॉजिकल मदद दिया जाना बहुत जरूरी है। वर्ना जिस टीम लीडर को सरेआम कंपनी के मालिक द्वारा नाकाबिल करार दे दिया जाएगा वह कैसे भविष्य के क्रिकेट में परफॉर्म कर पाएगा।





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