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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़.
क्रेच में आए बच्चे घर से और मम्मी-डैडी के पास से पहली बार दूर हो रहे होते हैं। कुछ घंटे क्रेच में बिताने के दौरान वे जो भी सीखते हैं वह उनके लिए स्थाई हो जाता है। ऐसे में क्रेच में बच्चों को संभालने वाली टीचर्स का प्रशिक्षित होना जरूरी है ताकि वे बच्चों को बेहतर तरीके से समझ कर बड़े होने में उनकी मदद कर सकें। इसी मकसद से सेक्टर-23 स्थित बाल भवन मेंक्रेच टीचर्स की वर्कशॉप चल रही है।
इसमें टीचर्स को एजूकेशनल किट (3 साल से 6 साल के बच्चों के लिए) बनानी सिखाई गई है। वर्कशॉप पंजाब समाज कल्याण विभाग और इंडियन काउंसिल फॉर चाइल्ड वेलफेयर के सहयोग से चलाई जा रही है। दस दिवसीय यह वर्कशॉप बुधवार को संपन्न होगी।
इन्हें शामिल किया एजूकेशनल किट में
पपेट, मास्क, फिंगर, थम्ब, थ्रेड, वेजीटेबल, हैंड पेंटिंग, पेपर टेरिंग से बनी कलाकृतियां, पेपर फोल्डर्स, गिनती, ए, बी, सी के पोस्टर बनाना शामिल हैं। वर्कशॉप में रोपड़, चमकौर, आनंदपुर साहिब, तलवाड़ा से आई तीस टीचर्स ने काफी रुचि ली।
ट्रेनिंग को आजमाएंगे क्रेच में
तलवाड़ा के एसजीएन मेडिकल वेलफेयर सोसायटी से आई टीचर रेखा, अंजू, बबीता रानी, रेनू बाला, पंकज पाठक ने बताया कि पहले हम क्रेच में बच्चों को चार्ट से अक्षरों का ज्ञान करवाते थे, लेकिन वर्कशॉप में आकर हमने क्रिएटिव ढंग से बच्चों को पढ़ाना सीखा है। इस तकनीक को हम अपने क्रेच में इस्तेमाल करेंगे। रोपड़ से आई क्रेच टीचर सरोज रानी, कमलदीप, दर्शना देवी को पपेट से कहानी सुनाने की कला बहुत पसंद आई, इससे वे बच्चों की कहानी सुनने में रुचि बढ़ाएंगी। सोसायटी फॉर एजूकेशन रूरल एंड डवलपमेंट फॉर वुमन, आनंदपुर साहिब से आई टीचर कुलवंत कौर, महिला समाज कल्याण चमकौर साहिब की अंजू शर्मा ने कहा कि यह वर्कशॉप हमारे लिए बहुत लाभदायक साबित होगी।
स्ट्रेस फ्री रहते हैं बच्चे
वर्कशॉप की को-ऑर्डिनेटर तजिंद्र बाजवा ने कहा कि जब क्रेच में प्री-स्कूल एक्टिविटी बच्चों को करवाई जाती है, तो वे स्ट्रेस फ्री हो जाते हैं और साथ ही अधिक बिजी रहते हैं। उन्होंने बताया कि क्रेच का मकसद बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना होता है।
किस डवलपमेंट के लिए कौन सी एक्टिविटी
छोटी मांस पेशियों के लिए: स्टिक पपेट, पेंटिंग, पेपर कटिंग करना सिखाया जाता है।
बड़ी मांस पेशियों के लिए: उछलना, कूदना, एक्सरसाइज।
फिजिकल डवलपमेंट: थाली से अलग-अलग दालों को चुनकर निकालना, खिलौनों को एक स्थान से उठाकर दूसरी जगह रखना।
सोशल डवलपमेंट : दूसरे बच्चों के साथ मिलकर खेलना, आपस में खाना शेयर करना, रोल प्ले करना।
मेंटल डवलपमेंट: रंग, आकार, गिनती, सब्जियों, पशु, पक्षियों, वाहन का ज्ञान कराना।
लैंग्वेज डवलपमेंट: कविताएं, कहानियां सुनाना, अपने आस-पास की चीजों की जानकारी देना।
इमोशनल डवलपमेंट: स्टोरी को हाव-भाव के साथ सुनाना।
मोरल डवलपमेंट: अच्छी आदतें सिखाना। बड़ों का आदर करना, छोटों से प्यार, थैंक यू, वेलकम करना सिखाया जाता है।
पांच इंद्रियों के बारे दी जाती है जानकारी: बच्चों को पांच इंद्रियों का ज्ञान और उनके अहसास, स्वाद को क्रिएटिव ढंग से बच्चों को समझाया जाता है। जिससे कि वे चीजों को हमेशा याद रखें।