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समाज में समय की जरूरत है एनकाउंटर लॉ

जब-जब देश की सुरक्षा को आतंकवादियों, राष्ट्रद्रोहियों या संगठित आपराधिक गिरोहों से खतरा हुआ है, तब-तब पुलिस ने पूर्ण निष्ठा, देशभक्ति और समर्पण से अपनी सेवाएं अर्पित की हैं और यहां तक कि अपनी जान भी कुर्बान की है। औसतन वर्ष में पुलिस कुर्बानी की यह संख्या लगभग 850 है और यदि 1971 के बाद कारगिल युद्ध में शहीद फौजियों की संख्या से तुलना की जाए, तो यह कुर्बानी कहीं भी कमतर नहीं आंकी जा सकती है।

ऐसे में गुजरात केडर के भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ्तारी, आंध्रप्रदेश के पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी की आशंका ने एक गंभीर स्थिति निर्मित कर दी है, जो देश के लिए हितकर नहीं है। अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब अपराधी तत्व पुलिस पर पूरी तरह से हावी हो जाएंगे। अभी भी राजनीतिक-आपराधिक गठजोड़ से स्थिति कम भयावह नहीं है।

इसी वजह से यह एक कड़वा सच है कि भारतीय पुलिस अपने आपको माफिया, संगठित अपराधियों, सफेदपोश अपराधियों, आर्थिक जालसाजों से निपटने में असहाय पाती है जिसमें क्षितिज पर छाए आतंकवादियों ने एक और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य और गवाह नहीं मिल पाते हैं और थोड़े-बहुत मिलते भी हैं तो वे गवाह बन अपनी जानमाल जोखिम में डालना नहीं चाहते।

ऐसे कई उदाहरण हैं जब अपराधियों को अदालतों से गंभीर अपराधों में भी साक्ष्य के अभाव में छोड़ दिया गया या जमानत पर रिहा कर दिया गया और अब उन्हें पकड़ना नितांत दुष्कर हो गया है। उदाहरण के लिए दाऊद इब्राहिम भी 1980 में जमानत पर रिहा किया गया था और अब वह देश के बाहर से अपनी आतंकवादी गतिविधियों का संचालन कर देश के लिए लगातार खतरा उत्पन्न कर रहा है।

यही वजह है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार करते हैं कि फिलहाल ‘एनकाउंटर’ का कोई विकल्प नहीं है। हालांकि वे इस प्रकार के कत्ल के पक्ष में भी नहीं हैं और इस बात को भी समझते हैं कि ऐसा करने से उनके ही अधीनस्थ पथभ्रष्ट हो जाते हैं। फिर भी एनकाउंटर के संदर्भ में पुलिस अधिकारी भारतीय जनमानस के उस समर्थन से भी प्रभावित हैं, जो इसे ही कानून व्यवस्था को तत्काल नियंत्रण में लाने का एक माध्यम मानता है।

निस्संदेह प्रायोजित एनकाउंटर एक खतरनाक परिपाटी है और यदि ऐसे प्रायोजित एनकाउंटर होने लगें, तो अपराधियों तथा पुलिस अधिकारियों में क्या फर्क रह जाएगा? पुलिस वस्तुत: समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अपराधियों की गिरफ्तारी करने और सामाजिक संरक्षण के कार्य के लिए है किंतु पहले गोली चलाने और बाद में नाम पूछने वाली पुलिस को कानून और समाज का संरक्षक नहीं माना जा सकता है। ऐसे में कानून-व्यवस्था कायम रखने और अपराधियों के अत्याचार तथा आतंक को रोकने के लिए एक विशेष कानून की आवश्यकता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20 अपराधियों के अधिकारों का वर्णन करता है तथा एनकाउंटर जैसी किसी गतिविधि की अनुमति नहीं देता है। उधर, पुलिस का साफ कहना है कि इसके बगैर ऐसे दुर्दात आतंकवादियों या आपराधिक गिरोहों से निपटना नितांत असंभव है। अत: इसके लिए एक सुरक्षित एवं विधिसम्मत प्रक्रियात्मक कानून बनाए जाने की आवश्यकता है ताकि प्रायोजित एनकाउंटर की आवश्यकता ही न पड़े। इसके लिए अनुच्छेद 20 में आवश्यक संशोधन कर दुर्दात अपराधियों के संदर्भ में कैमरा ट्रायल जैसी प्रक्रिया अपनाकर धारा 273 के अंतर्गत अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाए जाने का प्रावधान किया जा सकता है।

अदालतों में ऑडियो-वीडियो या अन्य सभी साक्ष्य का परीक्षण कर आपराधिक स्थिति पर निर्णय लेने समेत साक्ष्य अधिनियम में आवश्यक प्रावधान कर गवाह की पहचान को छुपाकर रखा जा सकता है। इसी तरह पर्याप्त साक्ष्य के आधार पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ‘सरेंडर कम एनकाउंटर’ वारंट उच्च न्यायालय के अनुमोदन या अनुमोदन की प्रत्याशा में जारी किया जा सकता है। इसके तहत लगभग एक माह में अपराधी को आत्मसमर्पण करना होगा अन्यथा न केवल पुलिस वरन समाज के हर सदस्य को उसे मुठभेड़ में मारने का अधिकार होगा, जिससे अपराधी बच नहीं पाएगा। अपराधी के नजदीकी रिश्तेदारों तथा परिवारजनों के विरुद्ध भी कार्यवाही का प्रावधान होना आवश्यक है ताकि वे अपराधियों का साथ देने से विरत रहें या उसे गिरफ्तार करवाएं।

इस प्रकार का कानून बनाकर ही दुर्दात अपराधियों, आतंकवादियों व संगठित गिरोहों के अपराधियों को नियंत्रित किया जा सकता है। यदि वे आत्मसमर्पण नहीं करते हैं तो उन्हें मारकर समाज को इनके आतंक से मुक्ति मिल सकेगी। एनकाउंटर लॉ में ऐसे अपराधियों की परिभाषा, पुलिस प्रक्रिया, न्यायालयीन प्रक्रिया का समावेश होगा जिससे सरेंडर कम एनकाउंटर वारंट जारी किया जा सकता है।





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