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तिब्बत पर बना रहे संवाद

दृष्टिकोण. नई दिल्ली में आयोजित ओलिंपिक मशाल रैली के निर्बाध संपन्न होने पर भारत सरकार ने राहत की सांस ली होगी। हमारे यहां 1७,000 सुरक्षाकर्मी इसकी निगरानी में लगाए गए थे। इससे एक सवाल पैदा होता है, विशेषकर तब जबकि इसके साथ-साथ सैकड़ों तिब्बतियों ने राजघाट स्थित गांधीजी की समाधि से लेकर जंतर-मंतर तक समानांतर मशाल दौड़ पूरी की। प्रत्येक रैली ने अपना संदेश दिया। अब समय आ गया है कि तिब्बत को लेकर ठंडे दिमाग से भारतीय नीति निर्धारित की जाए।

यह देखकर करुणा उपजती है कि दुनिया में एक भी देश ने तिब्बत की आजादी की वकालत नहीं की। यहां तक कि तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा भी, जिनका पूरी दुनिया में मान है, इसके बारे में बोलने से झिझकते रहे। सच यह है कि धर्मशाला और बीजिंग के मध्य पिछले तीस वर्र्षो से शांतिपूर्ण माहौल में संवाद जारी है, लेकिन अब इसकी अनदेखी की जा रही है। भारत की भी ऐसी ही हालत है। भारत का चीन के साथ रिश्तों पर बहुत कुछ दांव पर लगा है। क्या दुनिया में एक भी ऐसा देश है, जो दूसरों के हितों की खातिर अपने राष्ट्रीय हितों को बलिदान करेगा?

भारत की प्रतिक्रिया बेहद संतुलित थी। 15 मार्च को विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता नवतेज सरना ने कहा- ‘ल्हासा की हिंसा और अशांत हालात तथा मासूम लोगों की मौत की खबरों से हम व्यथित हैं। हमें उम्मीद है कि इससे जुड़े सभी लोग परिस्थितियों को सुधारने की दिशा में काम करेंगे और बातचीत व अहिंसक तौर-तरीकों के जरिए चीन के इस स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत की समस्या के लिए जिम्मेदार कारकों को हटाएंगे।’ तिब्बती शरणार्थियों के सवाल पर उन्होंने कहा- ‘वे हमारे अतिथि हैं।

भारत में रहने वाले सभी लोग, चाहे वे भारतीय नागरिक हों या विदेशी, हमारे कानून से बंधे हुए हैं। दूसरे मेहमानों की तरह भारत में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों से उम्मीद की जाती है कि वे राजनीतिक गतिविधियों और ऐसे क्रिया-कलापों से बचें, जिससे हमारे दूसरे मित्र देशों से संबंध प्रभावित होते हों।’ सरकार ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। सरकार ने जहां चीन की संवेदनाओं का ख्याल रखा, वहीं नई दिल्ली में मशाल की निगरानी करने की उसकी मांग को ठुकरा दिया।

जबसे दलाई लामा के बड़े भाई ग्यालो थोंडप और चीनी सरकार के बीच वार्ता शुरू हुई है, तबसे अब तक दोनों पक्षों के बीच काफी सहमति बन चुकी है। 1978 से लेकर अब तक की कूटनीतिक वार्ता का रिकॉर्ड प्रोत्साहित करने के साथ-साथ चेतावनी भी देता है। 3 दिसंबर 1978 को चीनी नेता डेंग जियोपिंग ने ग्यालो थोंडप से वार्ता के दौरान तीन बातें कहीं- ‘तिब्बत चीन का हिस्सा है’; दलाई लामा तिब्बत के वास्तविक हालात का जायजा लेने के लिए वहां अपना शिष्टमंडल भेजने के लिए स्वतंत्र हैं और भारत से 50 तिब्बती धर्मगुरुओं को तिब्बत के विभिन्न भागों में शिक्षण की इजाजत दी गई।

12 मार्च 1979 को दलाई लामा के प्रतिनिधि से बीजिंग में मुलाकात के दौरान डेंग ने कहा- ‘दलाई लामा की वापसी का स्वागत है। वे वापसी के बाद फिर से बाहर भी जा सकते हैं।’ हालांकि बाद में चीन का जो प्रस्ताव दलाई लामा तक पहुंचा उसमें चीन की नई सोच और बातचीत में गंभीरता के साथ ही तिब्बतियों से अपेक्षा की गई थी कि वे ‘व्यापारियों की तरह सौदेबाजी’ नहीं करेंगे और चीन 1959 के बागियों को क्षमा कर देगा। ‘दलाई लामा के वापस लौटने पर उनके राजनीतिक और आर्थिक विशेषाधिकार वही रहेंगे, जैसे 1959 के पूर्व थे ।’ दलाई लामा ने इसे ‘तिब्बत के सवाल को उनके व्यक्तिगत स्तर तक समेटने’ की कोशिश करार देते हुए ठुकरा दिया। इसके बाद भी बीच-बीच में वार्ताओं के दौर चलते रहे।

८ मार्च १९८९ को चीन ने तिब्बत में मार्शल लॉ लागू कर दमन तेज कर दिया। इसके बाद 19 अप्रैल 1989 को ताग्दी ने हांगकांग में ‘प्रक्रियात्मक मसलों को सुलझाने’ के लिए वार्ता का प्रस्ताव दिया। २क् मार्च १९८९ को दलाई लामा ने न्यूजवीक से कहा- ‘मैं तिब्बत की आजादी की मांग नहीं कर रहा हूं’। जबकि ६ मार्च १९८९ को बीजिंग के हवाले से कहा गया ‘तिब्बत की आजादी को छोड़कर हर मसले पर बातचीत की जा सकती है।’ १९९३ को दलाई लामा को वापस बुलाने का प्रस्ताव फिर से किया गया।

११ अगस्त १९९३ को नई दिल्ली में पत्रकारों के समक्ष दलाई लामा ने खुलासा किया कि उनके भाई एक पखवाड़े पहले बीजिंग में थे और आरोप-प्रत्यारोप के बीच उनसे कहा गया कि चीन संवाद प्रक्रिया को जारी रखना चाहता है। आखिरकार दलाई लामा ने ३ अक्टूबर १९९३ को कोलकाता में सार्थक ढंग से अपना रुख रखा कि वे तिब्बत में स्वायत्त शासन चाहते हैं, न कि चीन से अलगाव।

११ मार्च १९९४ को दलाई लामा ने कहा कि चीन के वक्तव्य ‘सिर्फ मुझे तिब्बत लौटाने’ तक ही सीमित रहे। लेकिन, चीन के प्रस्तावों में और भी बहुत कुछ है। जैसा कि नई दिल्ली में १३ नवंबर १९९१ को चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने तिब्बत की आजादी को छोड़कर किसी भी मसले पर बातचीत करने के प्रस्ताव से पता चलता है।

खाई ऐसी नहीं है जिसे पाटा न जा सके। तिब्बत की बदहाली महज बयानबाजी से नहीं सुधर सकती। चीन का आमंत्रण शर्तो से बंधा है। २८ जुलाई १९८१ को हू योबेंग ने ग्यालो थोंदप से कहा- ‘दलाई लामा का वही राजनीतिक स्तर और जीवनशैली रहेगी, जैसी १९५९ से पहले थी। वैसे वे तिब्बत में रहने न जाएं और वहां कोई स्थानीय सत्ता न संभाले तो ज्यादा अच्छा है। निस्संदेह, वे समय-समय पर तिब्बत आ-जा सकते हैं।’ वे इसे कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

जुलाई २क्क्क् में दलाई लामा के प्रतिनिधि ने बीजिंग का दौरा किया। सितंबर २क्क्२ से संवाद प्रक्रिया शुरू हुई। ३क् जून और १ जुलाई को उनका शिष्टमंडल बर्न में चीनी दूतावास में चीन के प्रतिनिधिमंडल से मिला। फरवरी २क्क्६ को बीजिंग में तिब्बती शिष्टमंडल के साथ वार्ता का पांचवां दौर चला। जैसा कि दलाई लामा के प्रतिनिधि ने बताया कि आध्यात्मिक गुरु ‘बीच का रास्ता निकालने’ की कोशिश में हैं। दोनों पक्षों के शुभचिंतकों को शांति प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए। चीन के एक हिस्से के तौर पर ऐसे स्वायत्त तिब्बत का लक्ष्य होना चाहिए, जहां स्वायत्तता और तिब्बती संस्कृति अक्षुण्ण रहने की गारंटी हो।

-लेखक वरिष्ठ कानूनविद हैं।





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