संपादकीय. जयपुर में हुए बम धमाकों में पांच दर्जन से अधिक लोगों की मौत से हर कोई सदमे में है। स्पष्ट रूप से यह आतंकी कार्रवाई है। इस दुर्दात कार्रवाई को अंजाम देने वाले सामने नहीं हैं। इस तरह की कायरतापूर्ण कार्रवाई शांति भंग करने, सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और अस्थिरता पैदा करने के लिए होती है।
सभी के मन में यह सवाल जरूर है कि ऐसा क्यों हुआ? क्यों हमारी सुरक्षा एजेंसियां ऐसी काली करतूत करने वालों के इरादों का पहले से पता नहीं जान पाईं? देश पिछले दो दशक से अधिक समय से आतंकी गतिविधियों का शिकार बना हुआ है। लंबे समय से ऐसी घटनाओं का सामना करते हुए अब तक हमारी सुरक्षा एजेंसियों को इतना सक्षम तो हो जाना चाहिए था कि आतंककारी इतनी आसानी से अपना काम अंजाम नहीं दे सकें।
यह हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि हमारी सरकारों ने सुरक्षा एजेंसियों को प्रोफेशनल बनाने और उन्हें अपने तरीके से काम करने की छूट नहीं दी और उनके कामकाज में हमेशा राजनीतिक हस्तक्षेप रहा। इसका नतीजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है। पुलिस फोर्स को नए जमाने की जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए दी गई विभिन्न आयोगों की सिफारिशों पर अमल करना सरकार में बैठे लोगों की प्राथमिकता में नहीं होता।
इसीलिए यह देखा जा रहा है कि बार-बार ऐसी सूचनाओं के मिलने के बाद भी देश में ऐसी चुस्त व्यवस्था नहीं बन सकी है, जिसकी अपेक्षा की जाती है। सुरक्षा एजेंसियों की सुस्ती के चलते ही अजमेर में दरगाह के बाहर आतंकी विस्फोट होने के बाद भी इस बात की फिक्र नहीं की जाती कि ऐसा हमला फिर हो सकता है। बांग्लादेश के आतंकी संगठन हूजी का नाम भी कुछ दिनों पहले उजागर हो चुका है कि वह ऐसी वारदात देश के विभिन्न स्थानों में अंजाम दे सकता है।
जयपुर के बम हमलों के पीछे भी इसी संगठन का हाथ होने की आशंका सामने आई है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है कि इतनी सारी सूचनाएं होने पर भी कोई सुरक्षात्मक कदम क्यों नहीं उठाए गए। आमजन को इन आरोप और प्रत्यारोप से कोई सरोकार नहीं है कि केंद्रीय एजेंसियों ने राज्य को संभावित आतंकी हमले की सूचना दी थी या नहीं। यह उनके जीवन की सुरक्षा का मामला है और यह हादसा किसी भी एजेंसी की गफलत से हुआ हो, मगर जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से ही जवाब मांगेगी।
यदि वास्तव में सरकार लोगों के जानमाल की सुरक्षा के प्रति चिंतित है तो उसे अपनी चिंता अपने क्रियाकलापों से जाहिर करनी होगी। लोग इस बात से अब पूरी तरह ऊब चुके हैं कि घटना-दुर्घटना हो जाने पर सरकार और उसकी एजेंसियों की जबर्दस्त सक्रियता दिखे और समय गुजर जाने के बाद उसका कामकाज फिर पुराने र्ढे पर लौट आए।