जयपुर.
चांदपोल श्मशान घाट पर तड़के सात बजे से ही शवों का आना शुरू हो गया था। चांदपोल बाजार पर कुछ स्थानों पर सड़क पर बिखरी गुलाब की पंखुड़ियां यहां से गुजरे कदमों की दास्तां बयां कर रही थीं। चांदपोल की कुछ गलियां ऐसी भी थीं, जहां से जब किसी जवान का जनाजा निकला, तो चारों ओर पसरे सन्नाटे के बीच सिर्फ रामधुनी गूंज रही थी।
बुधवार सुबह पुरानी बस्ती की गलियां व मोहल्लों से जब भी कोई अर्थी उठती तो रुदन के स्वर हर किसी के सीने को छलनी कर रहे थे। पुरानी बस्ती में एक किलोमीटर के दायरे में से एक-एक कर करीब दस अर्थियां उठीं। आम दिनों में शोर व ट्रैफिक से व्यस्त रहने वाला बाजार आज शवों की संख्या गिनता प्रतीत हो रहा था।
आधे घंटे में लौटूगा : मंगलवार रात आधे घंटे में लौट कर आने की बात कह कर गया हरीश हनुमानजी के दर्शन कर घर नहीं लौटा। हरीश के पिता तीरथदास व छोटा भाई योगेश उसका इंतजार ही करते रहे। उसकी मां हरीश के आने व साथ खाना खाने की राह ताक रही थीं, लेकिन बम धमाकों ने इन सबके इंतजार पर एक बड़ा विराम लगा दिया जो कभी नहीं मिटेगा। योगेश कभी भाई के शव को देखता तो कभी मां व पिता को देख रो पड़ता। बुधवार को जब हरीश की अर्थी उठी तो मोहल्ले वालों के गले रुंध गए और आंखें नम हो र्गई। उसके बच्चे मानो कह रहे थे- ‘पापा, उठो।’आज उन्हें टॉफी की नहीं, पापा के उठने का इंतजार था।
मुआवजा नहीं, नौकरी दो : चांदपोल, लालडूंगरी व आदर्शनगर श्मशान घाट पर बुधवार सुबह से ही लोगों की शवयात्राएं पहुंचने लगी थीं। चारदीवारी की गली-मोहल्लों से लोगों के झुंड श्मशान घाटों की ओर बढ़ने लगे। इनमें कई सामाजिक व सांस्कृतिक संगठनों के कार्यकर्ता थे। सुबह नौ बजे बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता व कार्यकर्ता भी मृतकों के परिजनों को सांत्वना देने पहुंचे।
चांदपोल श्मशान घाट पर सबसे पहले स्थानीय विधायक सुरेंद्र पारीक पहुंचे तथा परिजनों को सांत्वना दी। इसके बाद भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर, भाजपा के प्रदेश प्रभारी गोपीनाथ मुंडे, सार्वजनिक निर्माण मंत्री राजेंद्रसिंह राठौड़, सूचना व जनसंपर्क मंत्री भवानीसिंह राजावत व शिक्षामंत्री कालीचरण सराफ व कांग्रेस के नेता महेश जोशी चांदपोल श्मशान पहुंचे। एक साथ आए नेताओं को देख मृतकों के परिजन व परिचित सकते में आ गए तथा नेताओं को खरीखोटी सुनाने लगे। मंत्रियों ने जब सरकारी मुआवजे की बात कही तो लोग भड़क गए। उन्होंने कहा इसे राजनीतिक मंच मत बनाओ। मुआवजा नहीं, मृतकों के परिजनों को नौकरी दो।
पांच बेटियां छोड़ चला पिता
पुरानी बस्ती बगरू वालों का रास्ता पर ताराचंद शर्मा घर बुधवार को बिल्कुल शांत था। आज मोहल्ले में भी किसी प्रकार का शोर सुनाई नहीं दे रहा था। हर समय आंगन में दौड़ लगाने वाली स्वाति की आवाज भी किसी ने नहीं सुनी थीं। उदित सूर्य के बाद ऊपर से पिता को आवाज दे चाय के लिए पुकारने वाली घर की सबसे बड़ी बेटी शीतल ने भी आज न चाय बनाई और न ही घर में पानी के लिए बर्तनों की आवाज आई।
बम धमाके ने परिवार के मुखिया ताराचंद की जान ले ली थी। ताराचंद की पांच बेटियां व एक बेटा (14) है। शीतल की शादी फरवरी में तय हुई थी। हर किसी के मुंह पर यही सवाल था कि शादी तो हो जाएगी पर इस परिवार का खर्चा कौन चलाएगा। ताराचंद धार्मिक अनुष्ठान का कार्य करता था।
मंगलवार को वह सांगानेरी गेट हनुमान मंदिर पूजा करने गया था। मां भगवती देवी जो कुछ वर्ष पूर्व अपने पति को खो चुकी है, उसकी आंखें तो बेटे ताराचंद का घर लौटने का इंतजार करती रहीं। उसकी आंख का तारा आतंकवाद के अंधेरे में कहां गुम हो चुका था। सबसे छोटी बेटी स्वाति व बेटा शशांक तो आज भी इंतजार कर रहे हैं कि पापा कह के गए थे कि मंदिर से प्रसाद लेकर लौटूंगा, लेकिन यह इंतजार तो कभी न खत्म होने वाला ही रहेगा। अब तो शशांक को ही बड़ी बहन को डोली में बैठाना पड़ेगा।