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सीखा जा सकता है पढ़ाया नहीं जा सकता

परदे के पीछे.राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी ने श्याम माथुर की किताब ‘सिने पत्रकारिता’ प्रकाशित की है। लगभग 2४0 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य मात्र 120 रुपए है। अनगिनत-अनवरत समाचार दिखाने वाले चैनलों के आने के बाद भी अखबारों की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है वरन् उनके पृष्ठ बढ़े हैं।

आजकल हर अखबार में फिल्मों पर बहुत सामग्री प्रकाशित हो रही है और पत्रकारों की आवश्यकता में इजाफा हो रहा है। इसी कारण देशभर में फिल्म पत्रकारिता सिखाने का दंभ भरने वाली बाजारू संस्थाओं की कुकरमुत्ता बढ़त सभी जगह देखी जा सकती है। बाजार की आवश्यकता के दौर में श्याम माथुर की किताब कुछ लोगों की मदद कर सकती है, क्योंकि इसमें सिने पत्रकारिता के इतिहास के साथ सिनेमा उद्योग की विशद जानकारियां भी उपलब्ध हैं।

आजकल फिल्म पत्रकारिता के नाम पर केवल सितारों के प्रेम प्रसंग के काल्पनिक किस्से प्रकाशित होते रहते हैं। सारा मामला सनसनी पर केंद्रित है। अखबारों में प्रकाशित फिल्म समीक्षा फॉमरूला फिल्म से भी ज्यादा फॉमरूला बद्ध है और अच्छे लोकेशन को फोटोग्राफी कहा जा रहा है, चबा-चबाकर संवाद बोलने को अभिनय माना जा रहा है। सारा मामला उतना सतही है, जितनी फिल्में हैं। कृषि प्रधान भारत अब फिल्ममय भारत हो चुका है और सिने पत्रकारिता में काम मिलने के अवसर बढ़ गए हैं।

मुंबई में प्रशंसा सुनने के आदी सितारों द्वारा प्रायोजित पत्रकार भी ऊंचे ओहदे पर केवल सितारे से निकटता के आधार पर बैठे हैं। हिंदी के तमाम वरिष्ठ संपादक भी मानते हैं कि आवेदन पत्र में ही भाषा की अशुद्धियों वाले लोगों की भरमार है और इस क्षेत्र में प्रतिभा का जबर्दस्त अकाल है।

श्याम माथुर की किताब पढ़ते समय हिंदी रंगमंच के भीष्म पितामह सत्यदेव दुबे की बात याद आई कि अभिनय सीखा जा सकता है, परंतु पढ़ाया नहीं जा सकता। इसी तर्ज पर हम फिल्म पत्रकारिता को भी ले सकते हैं कि यह सीखी जा सकती है, परंतु पढ़ाई नहीं जा सकती। इसके लिए सबसे पहले अच्छा पाठक होकर ढेरों किताबें पढ़ना जरूरी है और दूसरे चरण में फिल्म को किताब की तरह पढ़ने की कोशिश की जाना चाहिए।

साहित्य आधारित फिल्मों को देखने के पहले मूल पुस्तक पढ़नी चाहिए और उसको दूसरी बार फिल्म देखने के बाद पढ़नी चाहिए। टेलीविजन के उदय और व्यापार प्रबंधन के लोकप्रिय होने के दौर में किताबें पढ़ना हमने कम कर दिया है और यह राष्ट्रीय क्षति है। यह किताबों का नहीं कॉमिक्स का दौर है। कॉमिक्स सचित्र पटकथाएं हैं और फिल्मकार के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। श्याम माथुर की किताब सिने पत्रकार के लिए केवल पहला चरण हो सकती है। सिनेमा साक्षरता आसानी से नहीं मिल सकती और इसकी एकमात्र पाठशाला सिनेमाघर है। मल्टीप्लैक्स से ज्यादा सिखाता है ठाठिया एकल सिनेमाघर।





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