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महाराष्ट्र के मंदिरों में पुर्तगाली घंटियां

पुणे.पुर्तगाली घंटियां महाराष्ट्र के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों में कम से कम 35 घंटियों का संबंध पुर्तगालियों से है। ये घंटियां मूलत: महाराष्ट्र-गोवा तट पर चर्चो के टॉवरों में हमले के खतरे का संकेत देने के लिए लगाई गई थीं।

शौकिया इतिहासकार महेश तेंडुलकर ने इस बात का खुलासा करते हुए बताया कि इनमें से कुछ घंटियों पर पुर्तगाली भाषा में ‘डो बेवन सेंटो एमेरो (सेंट एमेरो की याद में समर्पित)’ उकेरा हुआ है। कई अन्य पर मदर मैरी की गोद में बैठे बालक यशु की तस्वीर भी उकेरी हुई है।

महाराष्ट्र के किलों पर एक किताब लिख रहे तेंडुलकर ने बताया कि अपनी किताब के लिए समाग्री जुटाने वे ऐतिहासिक इमारतों और मंदिरों में जाते थे, इसी दौरान वे इस विषय की ओर आकर्षित हुए। घंटियों का उद्गम खोजने के लिए उन्होंने पुर्तगाली भाषा भी सीखी।

उन्हें यह जान कर आश्चर्य हुआ है कि पुणो के भीमाश्ांकर मंदिर, विराटगढ़, सतारा जिले के वाई स्थित पांडवगढ़ और विराटगढ़ के किलों में इन घंटियों का कोई उल्लेख नहीं था। इस बात का भी कोई सबूत नहीं मिला कि इन घंटियों का ब्रिटेन या फ्रांस से कोई संबंध है। मराठा शासक पेशवा के सरकारी दस्तावेजों में दो पत्र जरूर मिले, जिनके मुताबिक ये घंटियां पेशवाओं के धुरंधर सेनापति चिमाजी अप्पा तब लाए थे, जब उन्होंने पुर्तगाली शासन के अधीन वसई और पश्चिम के तटवर्ती इलाके पर आक्रमण किया था।

मेडिकल उपकरणों के रखरखाव व मरम्मत संबंधी इंजीनियर तेंडुलकर बताते हैं, '1737 और 1739 के बीच चिमाजी अप्पा ने वसई पर हमला किया और पुर्तगाली चर्चो से ये घंटियां लेकर आए।' वे बताते हैं कि भीमाशंकर, जेजुरी के भैरवनाथ मंदिर, पौड के वागेश्वर मंदिर और रत्नागिरि स्थित कालबादेवी के मंदिर में भी पुर्तगाली मूल की घंटियां लगी हैं। उनके मुताबिक शिखर शिंगणापुर की तीन घंटियां और नासिक के प्रसिद्ध नरो-शंकर स्थित घंटी का व्यास सर्वाधिक है। एक मीटर व्यास वाली ये घटियां भी आक्रमणों के दौरान खतरे का संकेत देने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं।





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