विशेष संपादकीय. तुम जितना लहू बहा सको-बहा लो। हम उससे दुगना लहू जुटा लेंगे, बना लेंगे- चाहे प्रतिदिन उसे रगों में जलाना क्यों न पड़े। कुछ प्रहर ही तो बीते होंगे तुम्हारे कायराना, छिपे-ढके धमाकों को- कि हम दमखम से लौट आए।
हृदय पर पहाड़सा बोझ था-आजीवन बना रहेगा। किन्तु कत्र्तव्य-पथ से डिगे नहीं। हम जयपुरवासी हैं- गोविंदजी के अनुयायी- कर्मयोगी। हमारे भाई-बहनों की पीड़ा बांटने तड़के ही उमड़ पड़े। तुम्हारे पुंसत्वहीन प्रदर्शन का किन्तु अंत न आया। निर्लज्ज हो, चोर बने अपने पथभ्रष्ट होने के प्रमाण बुद्धू बक्सों को भेज दिए। धमाकों से पहले के चलचित्र क्यों उतारे? स्पष्ट है जिनसे जीवन छीन लिया, उन्हें प्रेम करने वालों को जीने से घृणा कराने का निकृष्ट उद्देश्य ही रहा होगा। जो इस पवित्र भू-भाग में सहज-सरल शैली में अपने परिवार के साथ आनंद से धर्म-कर्म में लीन हैं-उन्हें हिंसा के हैवानी दृश्य दिखाकर विचलित करने का। ऐसी भूल सभी विदेशी आक्रमणकारी कर चुके हैं।
हां, हम विचलित हैं, उद्वेलित हैं, आंदोलित हैं- किन्तु हमारी तुम कापुरुषों के समक्ष विवशता पर नहीं। क्योंकि हमें इसका भान है कि विवश तो तुम आतंकी हो अपने पापों को लेकर। हमारा रोष तो मानवीय है। हम तो अपनी उन फरिश्तों सी बच्चियों-महक और दीया को लेकर सदमे में हैं जिनके नन्हें गुलाबी हाथ किसी को खाना ही खिलाना चाहते थे। बच्चों को कलेजे से लिपटाने को आतुर उस मां को लेकर हमारी आंखें नम हैं जो पूर्वमुखी हनुमानजी के मंदिर में प्रसाद लेने रुकी थी। या मुंबई से आईं उन कन्याओं को लेकर स्तब्ध हैं जो परंपरागत बाजारों की चमक से उल्लसित थीं कि तुम्हारे अपवित्र हमले ने सब ओर अंधेरा कर दिया।
तुम्हारे कलुषित पत्र के उत्तर देने में हमें न रुचि है न आवश्यकता। किन्तु ललकार तो किसी की हमें स्वीकार्य नहीं। यह अभी बताना इसलिए भी प्रासंगिक है चूंकि शत्रुओं को भी मानवीय आधार पर पूर्व से सचेत करते रहना हम राजस्थानियों की गौरवशाली परंपरा रही है। इस उदारता का असुरों-लम्पटों ने लाभ भी उठाया है। आज भी उठा रहे हैं। किन्तु देश काल और वातावरण के अनुसार हममें भी परिवर्तन हो रहे हैं-पापियों पर कैसी दया? उनका तो संहार ही न्याय है।
एक और बात। कहीं तुम्हारे दुस्साहस के मूल में हमारे गरिमामयी राज्य में सुरक्षा-प्रबंध देखने वालों की दुर्बलता तो नहीं? राज-काज संभालने वालों की विफलता को भूलवश भी राजस्थानियों की शक्ति-सामथ्र्य से जोड़कर मत देख लेना।
इतिहास साक्षी है राज्यों की बागडोर अधिकांशत: आत्ममुग्ध, स्वार्थी और श्रीहीन नेतृत्व के पास रहती आई है। किन्तु कभी भी, किसी भी क्षण, कोई भी दिशाहीन नेतृत्व निद्रा से उठ, राजधर्म का दंड उठा सकता है। इसमें कितना समय लगता है, यह उसकी संवेदनाओं पर निर्भर है। यह सूचित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि जिन गुलाबी प्राचीरों पर कल रात तुम दानवों ने अपने रक्तरंजित पंजे छापे थे- उन्हें निश्चल आंसुओं ने भोर होते ही धो दिया। जिन नयनों में आंसू भर दिए थे उन्हें अपने नैनों से समेट लिया। हृदय से हृदय मिलाकर कहा-
हाथ बढ़ा सूरज किरणों के,
पोंछ रहा आंसू सुमनों के,
अपने गीले पंख सुखाते तरु पर बैठे कपोत-कपोती
भीगी रात विदा अब होगी, भीगी रात विदा अब होगी।
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