ये वे खिले हुए चेहरे हैं, जिनकी सकारात्मक ऊर्जा बम ब्लास्ट से उपजी गहरी पीड़ा को भी पछाड़ सकती है। गौर से देखें तो भीड़ पर नहीं, कुछ लोगों के मजबूत कंधों और फौलादी इरादों पर हमारी सामाजिक व्यवस्था टिकी है। सीरियल ब्लास्ट हुए तो ऐसे आदर्शे की पूरी श्रंखला बनती चली गई। हम कुछ प्रतिनिधि चेहरों को आपके सामने ला रहे हैं।
सरस्वती जैन, 78 वर्ष
वे पिछले 12 साल से खाना, फल, दूध, सूखे मेवे और जरुरत मंदों के लिए दवाई लेकर रोजाना एसएमएस अस्पताल जाती हैं। पिछले 25 सालों से महात्मा गांधी कुष्ठ आश्रम में कुष्ठ रोगियों की सेवा भी करती आ रही हैं। ब्लास्ट में घायल लोग उन्हें माताजी कहते हैं।
एरिक, डेविड और लिज
उम्र-30 साल, 28 साल, 31साल
व्यवसाय-एरिक और डेविड टीचर हैं। लिज हाउस वाइफ हैं।
वी ऑल आर ह्यूमन
ये तीनों यूएसए के रहने वाले हैं। पांच दिन पहले ही इंडिया पहुंचे हैं। माना जा रहा है कि पर्यटकों को निशाना बनाने के लिहाज से बम कांड किया गया है। ऐसे माहौल में ज्यादातर पर्यटक डर के मारे अपने होटल से भी बाहर नहीं निकल रहे हैं। जबकि ये लोग बाहर आए और एसएमएस हॉस्पिटल पहुंच कर ब्लड डोनेट किया। हॉस्पिटल में डोनेशन के लिए लम्बी कतार में भी लगे। डेविड ने कहा कि ‘वी ऑल आर ह्यूमन’। इंसान इंसान की मदद करता है। एरिक ने कहा ऐसे वक्त में अगर डर जाएंगे तो किसी के काम कब आएंगे।
राजीव अरोड़ा
उम्र- 53, निवासी- सी-स्कीम, व्यवसाय- ज्वैलर
ग्लब्स पहने और जुट गए
घटना की खबर सुनते ही अपने साथियों की मदद से हॉस्पिटल आए। वहां दो कमरे शवों से अटे पड़े थे। इनमें से कुछ की सांसें चल रही थीं। उन्होनें डॉक्टर्स की मदद के लिए हाथों में ग्लब्स पहन कर घायलों को उठाया और दूसरे कमरे तक ले गए। वहां पर कई घंटों तक नर्स कम्पाउंडर की तरह डॉक्टर्स की मदद की। इस बीच ब्लड की कमी हुई तो बाहर आकर लोगों को आवाज लगाई कि जो भी डोनेट करना चाहे खासकर सभी तरह के नेगेटिव ग्रुप वाले तो सीधे अंदर आ जाएं। आवाज सुनकर बाहर खड़े बहुत से बच्चे भी तैयार हो गए। इस बीच कुछ घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद पानी और ज्यूस लाकर पिलाया। ये सिलसिला सुबह 4:00 बजे तक चला।
तीन दिन से सेवा में लगे
हथरोई बावड़ी निवासी राकेश कुमार वर्मा, खेमचंद, राजकिशोर, कमल कुमार और आशुतोष मित्तल घटना के बाद से सुबह 6:00 से रात 12:00 बजे तक एसएमएस में घायलों की सेवा करते रहे। घटना की रात ही उन्होंने अलवर जिले के खेड़ली कस्बे के निवासी महेन्द्र सेन के शव को पहुंचाया। खेड़ली में जैसे ही वो पहुंचे माहौल में शोक की लहर थी। गुस्सा भी था। एक बार तो वे डर गए। वहां परिवार के लोगों की हिम्मत बंधाकर सीधे हॉस्पिटल आए। पिछले दो दिन से पांचों साथी स्वयं सेवी संस्थाओं की मदद से घायलों तक पानी, चाय, खाना पहुंचाने में मदद कर रहे हैं।
दुकान छोड़ी, पीड़ा हरी
धमाकों की गूंज सुनते ही बड़ी चौपड़ पर अपनी दुकान से निकल कर मेन रोड पर आए। उन्हें दो जगह धुएं का गुबार और हाहाकार सुनाई दिया। अपने साथियों के भरोसे दुकान छोड़कर सीधे घटना स्थल पर पहुंचे। कुछ घायल मौके पर तड़प रहे थे। आधा घंटे तक कोई ऑटो भी नहीं मिला। उसी समय मोबाइल से अपने साथी मनीष, मुकेश और अरविंद को बुलाया। घायल दो महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर हॉस्पिटल पहुंचे। घायलों का काफी खून बह रहा था। इमरजेंसी में परिचित डॉक्टर को बुलाया और उनका इलाज शुरू कराया। इस बीच दूसरे घायलों को भी वार्ड तक ले गए। मदद के दौरान उनके कपड़े खून से सन चुके थे, लेकिन सुबह 3:00 बजे तक वहीं पर डटे रहे। इस बीच जब ब्लड की मांग उठी तो सभी साथियों ने डोनेट किया।
डी.पी. सिंह चित्तौड़ा
उम्र - 42 साल, व्यवसाय - काउंसलर
फर्ज और जिम्मेदारी बताई
डीपी सिंह को घर पहुंचते ही विस्फोटों का पता चला। फौरन हॉस्पिटल गए। हादसे में घायल लोगों और उनके परिजनों को ढांढस बंधाया। उनके पानी पीने की व्यवस्था की। उन्हें मोटिवेट किया। उनके फर्ज और जिम्मेदारियों का अहसास कराया। उनके मन में उम्मीद की किरण जगाई। डीपी सिंह खुद काउंसलर हैं।
आर.सी. चौधरी
उम्र - 46 साल, व्यवसाय - डिस्ट्रीब्यूटर (लाइफ सेविंग इक्यूपमेंट्स )
खून के लिए लगाई पुकार
आर.सी. चौधरी शाम 7: 55 पर हॉस्पिटल पहुंच गए। लाश की शिनाख्त करने में परिवार वालों की मदद की। वहां करीब 50 शवों को कफन पहनाया। इसके बाद तुरंत ही अपने गोदाम से लाइफ सेविंग ड्रग्स और सर्जीकल इक्यूमेंट मंगवाए। डिसपोजेबल ग्लब्स और डिस इंफेक्टेट की कमी पड़ने पर तुरंत लेकर पहुंचे। जानकार और रिश्तेदारों को मदद के लिए हॉस्पिटल बुलवाया। उन्होंने बताया कि इमरजेंसी के बारामदे में घायलों का इतना खून बह रहा था जैसे वहां खून की बारिश हुई हो। खून डोनेट करवाने के लिए लोगों को गाड़ी में बिठा बिठा कर एमएमएस लाए। गाड़ी की कमी पड़ी तो अपने बेटे के साथ ट्रैक्टर लेकर अलग अलग कॉलोनी में पहुंचे और चिल्ला चिल्ला कर लोगों से ब्लड डोनेट करने की गुहार की।
दयाल सुखानी
उम्र- 50 साल, निवासी- कंवर नगर व्यवसाय- रेडीमेड गारमेंट
लाते रहे दवाईयां
शहर में जब अफरा-तफरी का माहौल था। उस समय वे बड़ी चौपड़ पर बाजार के काम से आए थे। ब्लास्ट का पता लगते ही सीधे एसएमएस हॉस्पिटल पहुंचे। वहां डॉक्टर्स ने कुछ घायलों को ऑपरेशन थियेटर के बाहर ही फर्श पर छोड़ दिया था। घायल दर्द से कराह रहे थे। सबसे पहले उन्हें पानी पिलाया और हिम्मत कर उनके बारे में डॉक्टर्स से बात की। इस तरह से पांच घायलों को बैड दिलाया। उन्हें डॉक्टर्स की लिखी दवाई लाकर दी। रातभर उनकी सेवा की। उनमें से कुछ लोगों को देर रात घर पहुंचाया।
विनीत सांखला
उम्र- 35 साल, निवासी- बगड़िया भवन, व्यवसाय- फोटो स्टेट की शॉप
अपनों से मिलाया
हॉस्पिटल में कुछ घायल भिखारी उपचार का इंतजार कर रहे थे। ऐसे में डॉक्टर्स को बुलाकर उनका इलाज शुरू कराया। उनके लिए दवाई का इंतजाम किया। घायलों ने परिचय दिया और घर का नंबर बताया तो उनके परिजनों को हॉस्पिटल बुलाया। रातभर कुछ इसी तरह की सेवा में लगे रहे। सुबह जाकर कुछ घंटे आराम किया। उसके बाद मृतकों के परिजनों से मिलने गए।
राजेश पांडेय
उम्र- 50 साल, निवासी- गोपाल बाड़ी, व्यवसाय- केबल ऑपरेटर
खुद बीमार फिर भी
गंभीर बीमारी से पीड़ित होने के बाद भी घटना के बारे में सुनते ही चारदीवारी के लिए रवाना हुए। एक दो जगह घटना स्थलों से जानकारी जुटाकर सीधे हॉस्पिटल गए। वहां ट्रोमावार्ड में रात भर घायलों की सेवा की। इसके बाद पहुंचे पोस्टमार्टम सेंटर जहां लाश सुपुर्द कराने में कर्मचारियों की मदद की और परिजनों का ढांढस बंधाया।
मनोज कुमार शर्मा
उम्र - 37 साल, व्यवसाय - गारमेंट एक्सपोर्ट
न महसूस हुई कमी
मनोज दिनरात लोगों की मदद में लगे रहे। दवा लाकर दी तो घायलों की मदद भी की। कई घायलों के परिजन हॉस्पिटल में नहीं थे, उन्हें मनोज ने अपनों की कमी महसूस नहीं होने दी। ब्लड डोनेट किया और दोस्तों से भी करवाया। लाशें और घायलों को देख काफी बुरा लगा। कई घायलों की हालत गंभीर थी। अगर इलाज में पल की भी देरी होती तो किसी भी जान जा सकती थी। ऐसे में किसी की जान बचाने से बेहतर और क्या हो सकता है।