जम्मू.
पिछले साल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जम्मू में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि सीमाओं को अप्रासंगिक बनाया जाना चाहिए। लेकिन एक हफ्ते के दौरान इंटरनेशनल बॉर्डर और एलओसी पर भीषण गोलीबारी की जो दो घटनाएं हुई हैं, उससे साफ हो गया है कि अभी सीमाएं प्रासंगिक ही रहेंगी। साथ ही सीमा पर भारत को और सैन्य ताकत झोंकनी पड़ रही है। सीमा पर घुसपैठ के लिए आतंकियों की बड़ी ‘फौज’ घात लगाए बैठी है। जम्मू कश्मीर में भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर और एलओसी पर एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। सीमा पर बसे गांवों के लोग भयभीत हैं। यूं तो पिछले साल के मुकाबले इस बार घुसपैठ की घटनाओं में कमी आई हैं लेकिन पिछले दिनों हुई दो घटनाओं ने माहौल तनावपूर्ण बना दिया है।
2002 के बाद पहली बार ऐसी फायरिंग
पिछले हफ्ते वीरवार शाम को 2002 के बाद पहली बार पाकिस्तान की ओर से सांबा में जबरदस्त फायरिंग की गई। एक हजार से ज्यादा राउंड फायर हुए और ग्रेनेड फेंके गए। करीब 15 कथित आतंकियों ने यह गोलीबारी की और बॉर्डर की कांटेदार तार काट डाली। इतनी फायरिंग पाक रेंजरों के सहयोग के बगैर नहीं की जा सकती। इसे सीधे तौर पर सीज फायर का उल्लंघन तो करार नहीं दिया गया लेकिन इसमें पाक की भूमिका से किसी ने इनकार भी नहीं किया। अगले दिन सांबा में हथियारों का जखीरा मिला।
रविवार सुबह सांबा के पास आतंकियों ने, जो संभवत: वीरवार रात को घुस गए थे, ने कत्लेआम शुरू कर दिया। पहले पति-पत्नी को मारा और फिर कुछ महिलाओं को बंधक बना लिया। 12 घंटे चली मुठभेड़ में दो जवानों सहित छह लोग मारे गए। दो आतंकी भी मारे गए। सोमवार को फिर सांबा में एक और आतंकी मारा गया। इसके दो दिन बाद तंगधार में एलओसी पर पाकिस्तान की ओर से जबरदस्त फायरिंग की गई। दोनों वारदातों में फ्लैग मीटिंग हुई लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।
बौखलाहट का नतीजा
आईएसआई की मार्फत इस समय पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ करवाने की फिराक में है। वजह यह है कि डेढ़ साल के दौरान राज्य में आतंकियों को जबरदस्त मार पड़ी है। कई आतंकी संगठनों का तो नामों निशान मिट गया। हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तयैबा, जैश-ए-मोहम्मद व अल बदर जैसे बड़े संगठनों की कमर टूट गई है। हिज्ब व लश्कर के कमांडरों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है। हालत ये है कि कोई आतंकी कमांडर बनने को तैयार नहीं हो रहा।
बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए कैडर ही नहीं बचा। ऐसे में जरूरी है कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकियों को किसी तरह राज्य में घुसा दिया जाए। सीमा पर तनाव का मुख्य कारण यही है। चार महीने बाद राज्य में चुनाव है और पिछले दो चुनाव गवाह है कि चुनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय चर्चा के लिए राज्य में जबरदस्त हिंसा करवाई जाती रही है। अगले महीने होने वाली अमरनाथ यात्रा भी आतंकियों का सॉफ्ट टारगेट रही है।
दिखावे के लिए काफी कुछ
एक साल में पाकिस्तान ने दिखावे के लिए बॉर्डर पर जबरदस्त परिवर्तन किए हैं। पक्की चौकियां बनाई जा रही है। कई जगह टावर खड़े किए जा रहे हैं। उधर, सेना और सुरक्षा एजेंसियां बराबर कहती रही है कि पीओके और पाकिस्तान में अभी भी आतंकी प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने भी वीरवार को श्रीनगर में माना कि बर्फ पिघलने के बाद घुसपैठ बढ़ सकती है।
अलगाववादियों के हौंसले पस्त
1. अलगाववादियों के हौंसले पस्त है। अब कश्मीर में बात-बात पर करवाए जाने वाले बंद नाकामयाब होते हैं।2. जिन दिवसों पर खून खराबा होता था अब नहीं होता।3. कट्टरवादी अलगाववादी नेता के नाम पर अब केवल हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अली शाह गिलानी ही बचे हैं।4. अलगाववादी चुनाव में कूदने के लिए उतावले हो रहे हैं। चुनाव के बायकॉट की मुहिम जोर नहीं पकड़ पा रही।
हाल की खुराफात
>> दस दिनों में सीमा पर दो बार गोलीबारी। >> सांबा में 12 घंटे चली मुठभेड़।>> सीमा पर बाड़ को पहुंचाया गया नुकसान।
अभी ही क्यों>> जेएंडके में सितंबर में विधानसभा चुनाव होने प्रस्तावित।>> अमरनाथ यात्रा में व्यवधान डालने के लिए।>> बर्फ पिघलने से हालात अनुकूल।
आतंकियों की हालत खराब
>> आतंकियों का सफाया हो रहा है। लोग अब सेना व सुरक्षा एजेंसियों को सहयोग देने लगे हैं।>> यूनाइटेड जेहाद काउंसिल जैसे संगठन ने भी माना कि अब जेहाद पीओके में है कश्मीर में नहीं।>> लोकल लोगों के मारे जाने पर आतंकी सरगना सैयद सलाहुदीन ने कहा, अब सुरक्षा बलों को ही टारगेट बनाएंगे।>> पूर्व आतंकियों ने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है।
बदलता रवैया
>> पहले आसिफ अली जरदारी ने कहा कश्मीर अहम मुद्दा नहीं है। उसके बाद पाकिस्तान को किन्ही कारणों से कहना पड़ा कि पाकिस्तान तो कश्मीर के आवाम के साथ है।>> दोनों देशों के बीच संबंध बहाली के प्रयासों के मद्देनजर पाकिस्तान सीधे तौर पर कुछ नहीं कर पा रहा।>> जब तक पाकिस्तान अपने अंदरूनी मसलों में उलझा रहा, तब तक सीमाएं भी शांत रही।