Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे
13 मई की शाम शाहरुख खान कोलकाता के ईडन गार्डन में अपनी टीम की अनपेक्षित जीत पर नाच-गाकर खुशी का इजहार कर रहे थे। इस समय उसके ग्रह इतने प्रबल हैं कि वह मिट्टी से सोना बना सकता है। सभी क्षेत्रों में ऐसी विरल सफलता को भाग्य का चमत्कार ही माना जा सकता है। पूरा श्रेय भाग्य को देकर हम इंसान का अवमूल्यन करते हैं। शाहरुख ने कड़ी मेहनत की है, परंतु इतनी मेहनत तो अनेक लोग करते हैं और उन्हें इस तरह की सफलता नहीं मिली।
प्रतिभा और परिश्रम के साथ ही कोई एक अनजाना रहस्यमय तत्व होता है, जो इतनी विराट सफलता दिलाता है। शाहरुख योग्य अभिनेता हैं, परंतु उसके पास दिलीप कुमार या अमिताभ बच्चन वाली अभिनय प्रतिभा नहीं हैं। देखने में वह साधारण शक्ल सूरत और मामूली कदकाठी के आदमी हैं और देवआनंद या राजकपूर की तरह चुंबकीय व्यक्तित्व वाला व्यक्ति नहीं हैं। वह फिल्म पृष्ठभूमि से नहीं वरन् दिल्ली के शिक्षित मध्यमवर्ग परिवार से आए हैं और उसके पास किसी शिखर राजनेता का सिफारिशी पत्र भी नहीं था।
दरअसल शाहरुख की सफलता की कहानी परी कथाओं की तरह है। अगर हम उसके जीवन पर कहानी बनाएं तो वह अविश्वसनीय पटकथा ही मानी जाएगी। जिस मन्नत नामक विशाल हवेली में वह रहते हैं, उसके सामने वाले फुटपाथ पर उसने अजीज मिर्जा के इंतजार में वड़ा पाव खाया है और ऐसी हवेली का मालिक बनने की कल्पना भी वह नहीं कर सकता था।
यह गौरतलब है कि शाहरुख खान नामक व्यावसायिक सफलता की यह किवदंती यथार्थ में कैसे बदली। ऋषि कपूर के साथ उसकी ‘दीवाना’ और अब्बास मस्तान की ‘बाजीगर’ भारत में आर्थिक उदारवाद के आसपास की घटनाएं हैं। इस उदारवाद के साथ ही ज्यादा कमाई वाला मध्यम वर्ग उभरा है और खर्च करने को बेताब देश में सूरज बड़जात्या ने अपनी शादी वीडियो नुमा फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ का प्रदर्शन किया और राम मोहन राय जैसे समाज सुधारकों की दशकों की साधना ध्वस्त करते हुए भारत में पांच दिन के उत्सव की तरह की शादियों का चलन प्रारंभ हुआ। सूरज से प्रेरणा लेकर आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने शाहरुख के साथ फील गुड वाली फिल्मों की श्रंखला ही बना दी और ठीक इसी कालखंड में अप्रवासी भारतीय दर्शकों के कारण डॉलर सिनेमा का उदय हुआ।
यह बाजार और विज्ञापन ताकतों के शिखर काल की शंखध्वनि का समय था और शाहरुख इनका प्रतीक बन गया। बाजार की शक्ति हर कालखंड में महत्वपूर्ण रही है, परंतु अपने नए अवतार में बाजार ने करिश्मा यह किया कि मांग और पूर्ति के अपने पारंपरिक खेल के साथ पहली बार अपना ग्राहक भी रचा। अनावश्यक चीजों के व्यापार में जीवन के लिए आवश्यक चीजों की बिक्री से कई गुना अधिक मुनाफा होने लगा, क्योंकि मध्यम वर्ग का गुलाम अब साहबों के जलसा घर में आ पहुंचा था। शाहरुख इस वर्ग का चहेता कलाकार है, क्योंकि सफलता की ऐसी परी कथाएं अब संभावना के दायरे में आ गई थीं।
इसी दौर में क्रिकेट में भी महेंद्रसिंह धोनी और इरफान पठान जैसे लोग सितारा बन गए थे। फिल्मी शाहरुखी सफलता के यह क्रिकेटी अवतार थे। यह बात अलग है कि शरद पवार ने इन सितारों को आईपीएल के मंचपर इकट्ठे खड़ा कर दिया। इसलिए 13 मई को शाहरुख और शोएब का ईडन गार्डन में नृत्य इसी तथाकथित शाइनिंग इंडिया की इस इत्तेफाक से पैदा हुई बाजारू समृद्धि का प्रतीक है। गौरतलब है कि इस भोंडे प्रदर्शन के समय नरगिस से मरने वाले लाखों और चीन के भूकंप की त्रासदी से बेखबर रास रंग मचाया जा रहा था।
भौगोलीकरण और उदारवाद में नेसडेक की ठंड से दलाल स्ट्रीट सिकुड़ जाता है, परंतु कहीं भी घटित मानवीय त्रासदी अखिल विश्व की आंख नम नहीं करती। संवेदनाओं का भौगोलीकरण नहीं हो पाया न मनुष्य के लिए करुणा का आर्थिक उदारवाद में कोई जगह है। शाहरुख एक बाजार है- न्यून नीली रोशनियों की बाहों में घिरा निहायत ही निर्मम बाजार। सफलता और समृद्धि की तलाश में हमने गुणवत्ता को खारिज ही कर दिया और इसी खारिज से उत्पन्न समाज ने शाहरुख को कबूल किया है। इसमें उसका कोई दोष नहीं वह भी तो मात्र मोहरा ही है।