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'डर मौत से नहीं उसके तरीकों से लगता है'

विशेष टिप्पणी. जयपुर में बिछाए गए आतंकी बारूद ने जो तबाही मचाई है उसकी भरपाई केवल सांत्वना और संवेदनाओं से ही हो पाना मुश्किल है। जयपुर, राजस्थान और इस तरह समूचे देश की चिंता अब यह है कि जो कुछ सुरक्षित बचा है उसे आग से कैसे बचाया जाए। पर यह आसान काम नहीं है। इसका आजमाया फामरूला भी नहीं है। अगर होता तो आतंकी अपनी कार्रवाइयों में कभी कामयाब नहीं होते। दवाएं, केवल बीमारियों से होने वाली मौतों को रोकने के लिए खोजी जा सकती हैं। अमेरिका पर आतंकी हमलों के लिए हवाई जहाज का इस्तेमाल किया गया और जयपुर में साइकिलों का। आतंकवाद ने हवाई जहाज और साइकिल के बीच फर्क खत्म कर दिया है।

आदमी मौत से नहीं, उसके तरीकों से डरता है। चीन में आए भूकंप और म्यांमार में हुई तबाही के लिए किसी को दोष नहीं दिया गया। हजारों लोग देखते-देखते दफन हो गए। प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली मौतों के साथ मनुष्य ने सीने पर पत्थर बांधकर जीना सीख लिया है पर कभी हार नहीं मानी। पर जयपुर में हुए बम धमाके इसलिए डरा देने वाले हैं कि इस तरह से होने वाली मौतों के खौफ से बचने का न तो कोई रास्ता ढूंढ़ा जा सका है और न ही लोगों को उसके साथ जीना सिखाया गया है। आतंकवाद ऐसा ज्वालामुखी है जिसका लावा न तो बहता हुआ दिखाई देता है व न ही मनुष्य उसमें अपने आपको झुलसता हुआ देख पाता है।

गृह मंत्रालय के आंकड़े सही भी हो सकते हैं कि सीमा पार के आतंकवाद की घटनाओं में कमी आई है। सच्चई यह है कि जयपुर जैसी एक घटना भी साल भर के आंकड़ों का मखौल उड़ा देने के लिए काफी है। जयपुर में हुए धमाकों के पीछे किस आतंकी गुट का हाथ रहा होगा, इसे जानने में आम आदमी की ज्यादा रुचि नहीं है। अमेरिका ने पिछले महीने दुनिया भर में सक्रिय जिन आतंकी संगठनों की सूची जारी की है, उसमें ढेरों नाम हैं। दूसरे यह कि आतंकवाद का असली चेहरा हमेशा ढंका हुआ रहता है।

लोगों की दिलचस्पी यह भी पता करने में कम होगी कि इसमें केंद्र की कितनी गलती रही है और राज्य सरकार की कितनी। संसद भी आतंकी हमले का शिकार बन चुकी है। आतंकवाद से मुकाबले की जिम्मेदारी सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। जिस देश में प्रति सात सौ लोगों के पीछे केवल एक पुलिसकर्मी हो, वहां यह कल्पना करना भी बेमानी होगी कि प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा पर नजर रखी जानी चाहिए। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि अपने पुलिस बल, सुरक्षा कवच को अत्याधुनिक और मजबूत बनाने की दिशा में राज्य सरकारें कितनी कमजोर और अक्षम हुई हैं।

अत: इस बात का पर्याप्त भरोसा नहीं कि जयपुर जैसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। चुनौती इसलिए भी ज्यादा गंभीर है कि आतंकी गतिविधियों में संलग्न तत्व मशीनी तत्परता और सफाई के साथ अपना काम करते हैं। न तो उनके पास इंसानी जज्बा होता है और न ही पश्चाताप करने के लिए आंसू। बीमारी शरीर के सबसे कमजोर अंग को ही सबसे पहले अपनी चपेट में लेती है। अत: यह मानने के पर्याप्त कारण ढूंढ़े जा सक ते हैं कि आतंकवाद की चुनौती से मुकाबले के लिए अपने पुलिस बल और सुरक्षा तंत्र में जिस तरह के सुधार की जरूरत थी, उसे राजस्थान में अभी अंजाम दिया जाना बाकी है।

साथ ही जनता के स्तर पर भी अपनी सुरक्षा को लेकर जिस तरह की मांग और तत्परता प्रकट होनी चाहिए, वह राजस्थान में अभी फूटी नहीं है। राजस्थानी लोग मौत से नहीं डरते। यहां के रणबांकुरों की गौरव गाथाएं इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में दर्ज हैं। पर यह तो किसी हालत में मंजूर नहीं हो सकता कि कायराना तरीके से किए जाने वाले आतंकी हमलों के बाद निरपराध लोग तो अपना खून सड़कों पर बहाते रहें और जो बच जाएं वे रक्तदान के लिए अस्पतालों के आगे कतारें लगाकर आंसू बहाते रहें।





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