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परस्पर विकास ही है असली टीम मंत्र

विकास मंत्र. टीम में व्यक्ति का विकास काफी हद तक वैवाहिक जीवन में व्यक्ति के विकास की तरह ही होता है। इसके बिना टीम और इसके सदस्यों में सुधार नहीं आता। वैवाहिक जीवन की तरह ही टीम के विकास के दौरान साझा अनुभव और संप्रेषण होना चाहिए, ताकि सदस्य एक-दूसरे से जुड़े रह सकें। जब वैवाहिक जीवन में विकास साझा नहीं होता है तो अंतत: दो लोगों का जीवन एक-दूसरे से अलग विकसित होता है।

वे एक टीम के रूप में काम नहीं कर पाते हैं। अगर इस तरह से काम करते हुए ज्यादा लंबा समय गुजर जाता है, तो वे अलग-अलग दिशाओं में और एक-दूसरे से बिलकुल अलग रास्तों पर पहुंच जाते हैं। इस स्थिति में एक को यह पता ही नहीं होता कि दूसरा क्या कर रहा है। अंतत: वे एक-दूसरे की परवाह नहीं करेंगे, उनके लक्ष्य भिन्न होंगे और वे संप्रेषण करना बंद कर देंगे। इस बात की संभावना है कि उनकी टीम टूट जाएगी।

किसी संगठन में टीम के विकास को एकजुट रखना टीम के लीडर की जिम्मेदारी है। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके कर्मचारी व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों ही दृष्टि से विकसित हों। इसके अलावा उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका विकास एक साथ टीम के रूप में हो। टीम के सदस्यों का विकास करते समय कई विधियां अपनाई जा सकती हैं।

सबसे पहले तो नियमित अंतराल पर यानी महीने में कम से कम एक बार इकट्ठे सीखें। इससे हर सदस्य को कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। फिर छोटी-छोटी टीमें बनाकर उन्हें किसी एक प्रोजेक्ट पर काम करने को कहा जाए। इससे उनमें एक परस्पर लगाव विकसित होता है।

अंत में उन्हें विभिन्न सम्मेलनों, सेमिनारों और कार्यशालाओं में भेजा जाए। फिर लौटने पर अन्य को सिखाने को कहा जाए। इस तरह प्रत्येक सीखने और सिखाने के लिए तैयार रहता है। टीम का यही गुण और मकसद होता है।





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