आलेख.
दिल्ली देश की राजधानी ही नहीं आधुनिक महानगर भी है। यहां के लोग शिक्षित, उद्यमी, संपन्न और दूसरों से प्राय: हर दृष्टि से आगे दिखाई देते हैं। राजधानी होने के कारण दिल्ली वालों में अन्य की तुलना में जागरूकता भी अधिक होती है। पुलिस और कानून- व्यवस्था अन्य राज्यों की अपेक्षा चुस्त-दुरुस्त है। बावजूद इसके पिछले दिनों यह दुखद खबर आई कि दिल्ली के पास गाजियाबाद में तीन भाइयों ने तांत्रिक के चक्कर में अपनी मां की हत्या कर दी।
चौंकाने वाली बात यह है कि इन भाइयों में एक इंजीनियरिंग का छात्र है, दूसरा एमबीए की पढ़ाई कर रहा है और तीसरा 12वीं की परीक्षा दे चुका है। इन लोगों ने हत्या के लिए अपने एक चचेरे भाई की मदद भी ली, वह भी शिक्षित है।
बाद में तांत्रिक के इस सुझाव पर कि मां को वापस जीवित करने के लिए चार लड़कियों की बलि दी जानी जरूरी है। भाइयों ने अपनी बहन और उसकी तीन ननदों को यह कहकर बुलाया कि मां की तबियत ठीक नहीं है फौरन आ जाओ। उनके आते ही चारों भाइयों ने इन लड़कियों पर जानलेवा हमला किया, किंतु चीख-पुकार से भीड़ जुट जाने के कारण वे बच गईं और गंभीर हालत में अस्पताल पहुंच गईं।
यह लोमहर्षक घटना हमारे सामने कई सवाल खड़े करती है। आखिर वे कौन सी स्थितियां हैं जो हमारे युवाओं को तांत्रिकों के चक्कर में डालती हैं। उपरोक्त घटना अगर किसी पिछड़े इलाके में अनपढ़ लोगों के बीच घटी होती, तो इसके कारण तय करना कठिन नहीं था। दिल्ली में रहते हुए इंजीनियरिंग और एमबीए जैसी विज्ञान सम्मत पढ़ाई करने वाले तांत्रिकों की शरण में चले जाएं और मां की हत्या तक कर दें, यह चिंता और चिंतन के लिए उच्च प्राथमिकता वाला विषय है।
यह जानना जरूरी है कि वह कौन सा भय है जो हमारे युवाओं को तंत्र-मंत्र, अंगूठी-नगीनों और छुआछूत की ओर ले जाता है। हमारी शिक्षा में जरूर कोई कमी है जो डिग्रियां तो दे रही है लेकिन विज्ञान का ज्ञान या वैज्ञानिक दृष्टि नहीं। टीवी, कंप्यूटर, आईपॉड, लेपटॉप, मोबाइल जैसे विज्ञान के चमत्कारों से लदी-फंदी रहने वाली पीढ़ी कैसे अंधविश्वासों के दलदल में फंस रही है।
कारणों की तरफ जाएं तो इसके पीछे तुरत-फुरत धन की लालसा दिखाई देती है। बाजार हर दिन कुछ न कुछ नया लेकर आ जाता है और मार्केटिंग इस तरह से होती है कि चलन में भी जल्दी आ जाता है। ऐसे में तुरंत पैसा नहीं हो तो दिक्कत पैदा होती है। दिखावे की दुनिया में प्रतिष्ठा के पैमाने अलग होते हैं। आए दिन की पार्टियां, डिस्कोथेक, फैशनेबल कपड़े, महंगे जूते आदि ऐसी चीजें हैं जिनके लिए अतिरिक्त पैसों की जरूरत होती है।
अधीरता विवेक को हर लेती है। अपने खर्चो को पूरा करने के लिए वे उधारी वाहन चोरी, ठगी, लूट जैसे काम भी करने लगते हैं। अनेक बार छात्राएं और उच्च मध्यम वर्ग की फैशनपरस्त युवतियां भी अनैतिक कार्यो में लिप्त पाई गईं। घर से झूठ बोलकर या घर का कीमती सामान बेचकर पैसा बनाने की प्रवृत्ति सामान्य है ही।
इनके चलते टीवी और फिल्मों के असर को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। टीवी के समाचार चैनल भी अपराध और ग्लैमर के अनावश्यक दृश्यों से भरे रहते हैं। सीरियल्स में फूहड़ आधुनिकता और मूल्यहीनता परोसी जा रही है। यही नहीं चारित्रिक पतन का औचित्य सिद्ध करने का अनैतिक प्रयास किया जाता है। इसका सीधा असर हमारी नई पीढ़ी में विकृति के रूप में सामने आ रहा है।
यह देखना भी जरूरी है कि बच्चों के सामने हम कौन सा लक्ष्य रख रहे हैं। कहने को अच्छी शिक्षा हमारी प्राथमिकता है किंतु वास्तव में हम डिग्री और उसके जरिए एक पैकेज का लक्ष्य बनाए होते हैं। शैक्षणिक संस्थाएं भी हमारे इस दृष्टिदोष का पूरा फायदा उठाने में कसर नहीं छोड़ती हैं और रटंत तोते या रोबोट तैयार करने वाली फैक्ट्रियों की तरह काम करती हैं।
परिणामस्वरूप युवाओं में सामाजिक-नैतिक मूल्यों का विकास नहीं हो पाता है। पैकेज तक पहुंचने के लिए तमाम अनिवार्य बातों की उपेक्षा घर से ही आरंभ हो जाती है। यही वजह है कि जब तैयार रोबोट में माता-पिता राम या श्रवण कुमार खोजने की कोशिश करते हैं, तो निराशा हाथ लगती है और उनका आखिरी पता कोई वृद्धाश्रम बनता है।
जब हम अपनी भाषा, संस्कृति और मूल्यों की उपेक्षा शिक्षा में करेंगे तो परिणाम विकृति के रूप में ही मिलेंगे। इन दिनों हमारे पाठ्यक्रमों में से साहित्य, इतिहास, मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र और समाज शास्त्र जैसे विषय गायब होते जा रहे हैं। स्कूलों में तो इनकी पढ़ाई बंद हो चुकी है। उच्च शिक्षा में भी ये विषय अछूत समझे जाते हैं।
लेकिन ये मनुष्य और समाज के लिए जरूरी हैं क्योंकि यह ज्ञान हैं, इनसे गुण पैदा होते हैं। दूसरे विषय एक तरह का प्रशिक्षण हैं जो धन पैदा करने के काम आते हैं। आज ज्ञान और गुण को दृष्टि में रखकर अगली पीढ़ी तैयार करने की जरूरत है अन्यथा रोबो पुत्र ‘धन’ के लिए मां का शीश उतारते रहेंगे। jc.jc@rediffmail.com