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कैसी छाप छोड़ेंगे प्रधानमंत्री!

दृष्टिकोण. pm यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की समकालीन राजनीति में किसी के साथ तुलना की जा सकती है तो वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ही हो सकते हैं। दोनों अपनी सत्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं, एक शिक्षाशास्त्री है तो दूसरा नाटककार। दोनों में किसी को करिश्माई जननेता नहीं माना जा सकता, यद्यपि दोनों ने ही अपनी सुधारवादी नीतियों और नए आर्थिक मंत्रों को अंगीकार कर मध्य वर्ग में अपने लिए खास जगह बनाई है।

दोनों बेहद संवेदनशील इंसान लगते हैं, जो आमतौर पर राजनेताओं की परंपरागत छवि से बेहद असहज नजर आते हैं। यही कारण है कि जब बुद्ध बाबू ने प्रधानमंत्री को ऐसे व्यक्ति के तौर पर निरूपित किया जो ‘हर मोर्चे पर असफल रहा है’, तो लोगों का इस पर ध्यान जाना स्वाभाविक था।

लालकृष्ण आडवाणी जब मनमोहन सिंह को ‘अब तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री’ बताते हैं तो यह एक राजनीतिक विरोधी द्वारा की गई बयानबाजी लगती है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का हमला पंचायती चुनावों की सरगर्मियों के बीच हुआ है। यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री अपने अंतिम वर्ष के कार्यकाल के दौरान धीरे-धीरे अलग पड़ते जा रहे हैं।

क्या डॉ. सिंह हर लिहाज से ‘असफल’ रहे? शायद, यह सवाल ही गलत है। किसी देश का प्रधानमंत्री होना अंतिम वर्ष की परीक्षा में पास होना जैसा नहीं है, जहां नंबर देना जरूरी हो। प्रधानमंत्री का पूरा कार्यकाल सफलताओं और असफलताओं का मिला-जुला रूप होता है। जवाहरलाल नेहरू के 17 साल के कार्यकाल के दौरान अविस्मरणीय उपलब्धियां हासिल हुईं, जिसमें 1952 के आम चुनाव उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन कहीं-कहीं असफलता भी मिली। 1962 का भारत-चीन युद्ध इसका ज्वलंत उदाहरण है।

इंदिरा गांधी के साथ 1971 का आभामंडल जुड़ा हो सकता है, लेकिन इसके चार साल बाद ही आपातकाल लगाने का दोष भी उन्हीं के सिर है। राजीव गांधी ने देश में तकनीकी क्रांति का आगाज किया, लेकिन उन्होंने कुछ ऐसी राजनीतिक गलतियां कीं, जिसने देश को हिंसा की आग में झुलसने के लिए छोड़ दिया। नरसिंह राव ने मुक्त अर्थव्यवस्था की शुरुआत की, लेकिन उनके कार्यकाल में राजनीतिक शुचिता का पतन हो गया। अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाकर महान सोच दर्शाई, लेकिन वर्ष 2002 में गुजरात की घटनाओं के संदर्भ में उनकी कमजोरी भी जाहिर हुई।

मनमोहन का प्रधानमंत्रित्वकाल भी थोड़ा सूक्ष्म विश्लेषण की मांग करता है। इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि पिछले चार वर्षो में प्रधानमंत्री कार्यालय की साख बढ़ी है। लाल बहादुर शास्त्री के बाद मनमोहन सिंह ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन पर या उनके परिजनों पर किसी स्कैंडल में लिप्त होने के आरोप नहीं लगे। जिस दौर में हम रहते हैं, उसमें यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, लेकिन यही पर्याप्त नहीं है।

दुर्भाग्य से जहां मनमोहन सिंह ने नैतिकता के उच्च प्रतिमान स्थापित किए, वहीं राजनीतिक स्तर पर उन्हें जूझना पड़ रहा है। नीति सलाहकार अथवा वित्त मंत्री के तौर पर भी कोई सिर्फ ईमानदारी का तमगा लेकर तो चल सकता है, लेकिन एक प्रधानमंत्री को सफल होने के लिए व्यक्तिगत शुचिता के अलावा और भी कुछ चाहिए। कुछ हद तक मनमोहन सिंह की कुलीन, शांतिप्रिय छवि में गलती नहीं है। मुख्य दुविधा तो केंद्र की सत्ताधारी व्यवस्था की प्रकृति में है।

राजनीतिक शक्ति का केंद्र दस जनपथ में निहित है और प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ कार्यकारी नेतृत्व और उसकी शक्तियां निहित हैं। सोनिया गांधी ने भले ही सद्भावना के तहत खुद प्रधानमंत्री का पद त्यागते हुए मनमोहन सिंह को नियुक्त किया हो। हालांकि, असलियत में समानांतर सत्ता का केंद्र बनाने का मतलब यही है कि प्रधानमंत्री को प्रभावी रूप से कामकाज के लिए जो स्वतंत्र दायरा मिलना चाहिए, उसे काफी हद तक घटा दिया गया है।

गठबंधन सरकार में क्षेत्रीय नेता और पार्टी सहयोगी खुद को दूसरों से बड़ा मानते हैं। हालिया दौर में यूपीए सरकार के साथ यही हुआ है। करुणानिधि, अंबुमणि रामदास, टीआर बालू मनमानी पर उतारू हो सकते हैं और कोई उन पर लगाम नहीं कस सकता। वाम दल तमाम व्यापक नीतिगत मसलों पर वीटो पावर का इस्तेमाल कर सकते हैं और असहाय सरकार नुकसान को रोकने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकती।

सहयोगियों की बात छोड़िए, अब तो कुछ कांग्रेसी मंत्री भी स्वतंत्र मुखिया की तरह बर्ताव करने लगे हैं। आखिर क्यों प्रधानमंत्री को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आयरन और स्टील निर्यातकों पर प्रभार लगाने हेतु अपने ही कुछ मंत्रियों को राजी करने के लिए संघर्ष करना पड़ा? इस संदर्भ में ‘विरासत’ एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसके आधार पर इतिहासकार प्रधानमंत्रियों का आकलन करते हैं।

नेहरू की विरासत आधुनिक लोकतंत्र की नींव रखने में निहित है। इंदिरा मजबूत राष्ट्रवाद के विचार की जननी बनीं। नरसिंह राव आर्थिक उदारीकरण के अगुआ बने। वाजपेयी संभवत: पोकरण-2 को एक निर्णायक क्षण के तौर पर देखें। यहां तक कि तकरीबन एक साल प्रधानमंत्री रहे वीपी सिंह ने भी आने वाली पीढ़ियों के लिए आरक्षण की राजनीति की विरासत छोड़ दी।

प्रधानमंत्री के तौर पर अपने पांचवें साल में मनमोहन सिंह जरूर इस बारे में विचार करेंगे कि इतिहास उन्हें किस तरह याद रखेगा। इसी वजह से भारत-अमेरिका परमाणु करार की बातचीत में अगले कुछ हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। एक मायने में यह करार मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व को परिभाषित कर सकता है। क्या उनमें वाम दलों की परवाह न करते हुए करार पर आगे बढ़ने का राजनीतिक साहस है? या फिर वे अपने विश्वास की अपेक्षा सरकार के टिके रहने को तरजीह देंगे? सोनिया गांधी के लिए भी यह निर्णायक क्षण है।

आखिरकार उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री घोषित करते वक्त कहा था कि वे इस पद के लिए सबसे योग्य व्यक्ति हैं। यदि तब उन्होंने मनमोहन पर भरोसा जताया तो अब भी विश्वास करना होगा। अब समय आ गया है कि मनमोहन सिंह तमाम आशंकाओं को परे रख दें और भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से जरूरी परमाणु करार पर आगे बढ़ते हुए साबित कर दें कि वे ही असली प्रधानमंत्री हैं।

जहां तक बुद्ध बाबू की बात है, तो उन्हें भी संभवत: प्रधानमंत्री की आलोचना करने से पहले अपने ही घर में नंदीग्राम के चलते बिगड़े हालात को सुधारने की जरूरत है। डॉ. मनमोहन सिंह और बुद्धदेब के पास यह साबित करने का ऐतिहासिक अवसर है कि सौम्य, मध्यवर्गीय विचारों का देश की राजनीति में भविष्य है। उन्हें इसे गंवाना नहीं चाहिए।

लेखक सीएनएन-आईबीएन के एडिटर इन चीफ हैं।





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