जब बड़े-बड़े खेल चल रहे हों तो छोटी बात क्यों! इसे समझते हुए आज के आधुनिक जमाने में हॉकी, कबड्डी, फुटबॉल, दंगल, कुश्ती, खो-खो जैसे कमतर खेलों की वकालत क्यों की जाए? वह भी तब, जब वैभवपूर्ण सर्वमहिमा संपन्न क्रिकेट को खेलमंत्री से अधिक रेलमंत्री और कृषि मंत्री का पावन सहयोग प्राप्त हो। इस सहयोग को देखते हुए सरकार को भी उसे आज नहीं तो कल, औपचारिक रूप से राष्ट्रीय खेल घोषित करना ही पड़ेगा। फिर क्यों क्रिकेट से इतर अलग खेलों पर निगाह डाली जाए।
कितनी सारी मशक्कत हुई है तब कहीं जाकर यह क्रिकेट हमारी राष्ट्रीय क्रीड़ा का अभिन्न अंग बन पाया है। यह कोई चमत्कार नहीं है और ऐसा कोई एक दिन में भी नहीं हुआ है। इसके पीछे तमाम लोगों की अथाह मेहनत छिपी हुई है। तमाम उत्पाद कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों और रेडियो-टीवी वालों के कर कमल लगे, तब जाकर कहीं यह सब संभव हुआ। वे सारे महान हाथ आज मुट्ठी बन गए हैं। उन मुट्ठियों में सिक्के ही सिक्के हैं। मुट्ठियां बंद हैं कि कहीं गिर न जाएं, ये सिक्के जमीं पर। अगर ऐसा होगा तो फिर महिमा ही क्या रह जाएगी।
सोचिए, कल किसी कंगले गेम को राष्ट्रीय खेल की मान्यता मिल जाए, तो क्या होगा? उसके खिलाड़ी नंगे बदन दौड़ेंगे। अब आप ही कहिए, भला आज के समय में नंगेपन का भी कोई क्रेज है। यहां फिल्मों की बात नहीं कर रहे हैं। नंगा होकर ही पैसा कमाना हो तो कोई स्पोर्ट्स की फील्ड में क्योंकर जाने लगा? नंगों के लिए तमाम और रास्ते खुले पड़े हैं।
आज क्रिकेट में पैसा, सम्मान है। पैसा भी थोड़ा-बहुत नहीं, अनाप-शनाप। दूसरे खेलों के पास क्या है? ठेंगा, फिर अपने यहां हॉकी के हाल तो और भी बुरे हैं। बेचारों का सेलेक्टर खुद इतना निर्धन है कि वह उलटा खिलाड़ियों से ही पैसे मांगता है। ऐसे में क्रिकेट को छोड़कर क्यों ध्यान दें हॉकी या अन्य खेलों पर।
दुनिया कहती है कि हिंदुस्तान में क्रिकेट को धर्म की तरह पूजा जाता है और इसके खिलाड़ियों को भगवान समझा जाता है। यह बात पहले मेरे गले नहीं उतरती थी। अब इस आईपीएल के प्राकट्य के बाद स्वीकार करने को मजबूर होना पड़ रहा है। जिन्हें इतना चढ़ावा मिलता हो, वे भगवान ही होते हैं वरना क्योंकर लोग भारी-भरकम चढ़ावा चढ़ाने लगे।
अब तो बात यहां तक बढ़ चुकी है कि सबके अपने-अपने भगवान हैं। जितने ऊंचे कद की मूरत, वैसी कीमत। भक्त-भक्तिनियों की ऊंची बोलियों के शोर में प्रभु प्रसन्न हैं। प्रभु के एक हाथ में बैट और दूसरे में बॉल है। वे क्रीड़ा कर रहे हैं। अप्सराएं नृत्य कर रही हैं। बिलकुल स्वर्ग में इंद्र के दरबार सा मनोहारी दृश्य है। श्रद्धालुजन इनके साक्षात दर्शनों का लाभ उठाकर धन्य-धान्य हो रहे हैं।
एक समय में इतने अवतार तो त्रेता-द्वापर में भी नहीं हुए होंगे। सब कलयुग की माया है। अब ‘माया’ का दूसरा नाम ही तो क्रिकेट है। ब्रrा और जीव के बीच माया की उपस्थिति ही जीवन का सार-तत्व है। ध्यान रहे यह सकल लोक प्रभु की क्रीड़ास्थली यानी स्टेडियम है और टीवी रूपी पर्दा ही यथार्थ रूप में मोह का परदा है, जो हम सबकी आंखों पर चढ़ा हुआ है। मुझे तो धीरे-धीरे यह भी विश्वास होने लग गया है कि क्रिकेटर्स के इस ग्लैमर स्वरूप को निरखकर तो एक बार भगवान भी चकरा जाते होंगे कि अगर ये खिलाड़ी ही सच्चे हैं, तो फिर मैं कौन हूं?
हमने धर्म की किताबों में पढ़ रखा है भगवान निश्छल और सरल हृदय होते हैं। गौर कीजिए, ये अपने क्रिकेट प्लेयर्स भी तो वैसे ही हैं। किसी ने शर्ट-पैंट आदि वस्त्र भेंट कर दिए तो प्रेम के वशीभूत होकर धारण कर लिया। यह तक नहीं देखा कि भक्त ने उस शर्ट की पैंट-पीठ पर कौनसा विज्ञापनकारी श्लोक लिखा रखा है। कोई आया, कैप के आकार का मुकुट पहना गया, इन्होंने पहन लिया। कोई प्रेम का पुजारी ब्रांडेड कंपनी की पादुकाएं ले आया। वे प्रभु के चरणों की शरण पाकर भव सागर के पार उतर गईं। वास्तव में कितने भोले हैं, हमारे ये ग्लैमरस भगवान। बार-बार छवि निरखहुं तबहुं न नयन जुड़ात।
जहां का सारा धर्म आस्था पर टिका हुआ है, वहां पर आंख मूंदकर श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर मानना ही पड़ता है कि हमारे देश में क्रिकेट धर्म है और क्रिकेटर भगवान। मन कहता है-‘अहा, खेल ही खेल में तुमने कैसी सृष्टि रची है, लीलाधारी! हे मायापति, एक बार मिल जाओ तो श्रीशांत चित्त से हर भजन करते हुए तुम्हारे कोमल कपोल चूम लूं और झुककर तुम्हारे लेगगार्डयुक्त पावन चरण पखार लूं।
-लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।