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सनातन है कर्म करने का आनंद

विकास मंत्र. इस दुनिया में अधिकांश लोग काम शुरू करने से पहले ही मनवांछित फल की सोचने लगते हैं। ऐसे लोग कभी भी अपने काम को रुचि के साथ नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी निगाहें तो फल पर लगी होती हैं। हालांकि वे भी कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन फल की सोच-सोच कर वे तनाव और चिंता जरूर पाल बैठते हैं।

ऐसे में उनकी कार्यक्षमता में कमी आती है। इसके विपरीत कर्मयोग हमें यही सिखाता है कि काम करते जाओ फल की चिंता मत करो। पूरी जागरूकता, मनोयोग और रुचि के साथ किया गया काम मनवांछित फल लेकर ही आता है। चूंकि काम के दौरान पूरा ध्यान उसे करने में ही लगा रहता है अत: उसकी गुणवत्ता में भी और सुधार आता है।

कहा भी गया है फल या परिणाम हमारे हाथ में नहीं है। हमारे हाथ में तो सिर्फ कर्म करना ही है। ऐसे में फल के बारे में सोच-सोच कर अपनी ऊर्जा का क्षय क्यों किया जाए। फिर यह भी एक भ्रम ही है कि मनवांछित फल प्राप्त होने के बाद आपकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी। वास्तव में मनवांछित फल प्राप्त होने से जुड़ी खुशियां भी अस्थायी होती हैं। इससे जुड़ा रोमांच भी अस्थायी ही होता है।

हमेशा ध्यान रखें कि अगर कुछ स्थायी है तो वह है कर्म करने का आनंद। एक बार अगर आपने अपने कर्म और उसके फल से दूरी बना ली तो सही अर्थो में आप कर्मयोगी बन जाएंगे। कर्मयोगी बनने के बाद ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकेंगे। आपके द्वारा दिया गया यही सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन ही आपको लोकप्रिय बनाएगा और यह लोकप्रियता ही अंतत: फल देने का बाइस बनेगी। अत: जरूरी है कि कर्म पर ध्यान दें और पूरी ईमानदारी व मनोयोग के साथ उसे अंजाम दें।





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