दृष्टिकोण. देश पर आतंक का साया गहराता जा रहा है। इसके बारे में हमें समय-समय पर विदेशों से भी चेतावनी मिलती आ रही है। गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक कमेटी ने भारत की आतंकवाद से लड़ने की क्षमता पर संदेह जताते हुए कहा था कि देश में आतंकवाद से लड़ने का कोई कानून नहीं है, राज्यों के बीच सूचना के आदान-प्रदान में कमी है और हवाला द्वारा जो रुपया हिंदुस्तान में आ रहा है, जिससे आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद मिलती है, उस पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकार ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है।
दहशतगर्दी के चलते वर्ष २क्क्७ में २३क्क् से अधिक लोगों की जानें गईं। इसके बावजूद लचर कानून और शिथिल कानून प्रक्रिया में वांछित सुधार नहीं लाया गया। आतंकवाद कुछ वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर तक ही सीमित था, लेकिन अब उसका जाल धीरे-धीरे सारे देश में फैल गया है। सच तो यह है कि हमें पश्चिमी देशों की अपेक्षा आतंकवाद से लड़ने का ज्यादा अनुभव है। पचास के दशक के मध्य में जब नगा विद्रोहियों ने बगावत की, उस समय से आज तक देश के सुरक्षा बल किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं।
दुर्भाग्य से हमने इन अनुभवों का लाभ नहीं उठाया। नतीजा यह है कि जहां अमेरिका और ब्रिटेन ने अपनी आतंकवाद से लड़ने की नीति की स्पष्ट शब्दों में व्याख्या कर दी है, वहीं हमारा इस मसले पर ढुलमुल रवैया है। कारण साफ है। हर सरकार जो सत्ता में होती है, अपनी समझ के अनुसार और राजनीतिक लाभ की दृष्टि से इस समस्या से निबटना चाहती है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी नीति स्पष्ट करें और साफ-साफ कहें कि आतंकवादियों से कोई समझौता नहीं होगा। १९८९ में तत्कालीन गृहमंत्री की बेटी को छुड़ाने के लिए हमने आतंकवादियों को छोड़ा और उसके बाद से ही यह आग तेजी से फैलती गई। १९९९ में हमने कंधार विमान अपहरण कांड में जिस तरह से घुटने टेके और उसके बाद से जैश-ए-मोहम्मद ने भारत में जिस तरह से कहर ढाया, वह हमारे इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है।
आतंकवाद से लड़ने के लिए सख्त कानून की जरूरत है, इस पर अनावश्यक बहस होती है। कुछ लोग मौजूदा कानूनों को पर्याप्त बताते हैं तो कुछ लोग यह दलील देते हैं कि जब ‘पोटा’ था, तब भी आतंकी वारदातें नहीं रुकीं। हमें यह समझना होगा कि जब भारतीय दंड विधान की संरचना हुई, तब देश में आतंकवाद जैसी कोई समस्या नहीं थी।
इसके अलावा यह कहना कि पोटा के रहते आतंकवादी घटनाएं होती रहीं, अदूरदर्शिता का परिचय देता है। भारतीय दंड विधान में कई प्रकार के अपराधों का उल्लेख है और उसके लिए दंड का प्रावधान है। परंतु उसके बावजूद हत्या, राहजनी या बलात्कार के अपराध खत्म तो नहीं हुए। तो क्या हम भारतीय दंड विधान को रद्द कर दें? कानून एक औजार होता है अपराध पर अंकुश लगाने और अपराधियों को दंड देने के लिए। इसके अभाव में अपराधियों की चांदी रहती है।
सच तो यह है कि देश में आतंकवादियों को किसी घटना को अंजाम देने में कोई विशेष भय नहीं होता। वह जानते हैं कि देश का पुलिस तंत्र खोखला है। इंटेलीजेंस एजेंसी का ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा कीबजाय नेताओं और सत्ताधारी पार्टी के हितों को साधने में लगा है। इन हालात में आतंकियों के पकड़े जाने या उनके विरुद्ध अभियान चलने की संभावना अपने आप न्यूनतम हो जाती है।
अगर अभियोग चला भी तो इतना लंबा चलता है कि तब तक गवाह टूटने लगते हैं। और अगर सजा हो गई तो मानवाधिकार का मुखौटा पहने बहुत से बहरूपिए उनकी वकालत के लिए खड़े हो जाएंगे। आतंकवाद से निपटने के लिए यह बेहद जरूरी है कि दहशतगर्दो के दिल में पकड़े जाने और उसके बाद सख्त सजा की दहशत हो। परंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। सीमापार से जो भी आतंकी आते हैं, उनके लिए यहां विचरण करना एक पिकनिक जैसा हो गया है। योजना बनाकर उसे अंजाम देने में उन्हें खास दिक्कत नहीं होती। ऐसे में भला आतंकवाद क्यों नहीं फैलेगा?
पश्चिमी देशों में ९/११ के बाद आतंकवाद से जिस प्रकार निपटा गया, उससे हम दो सबक ले सकते हैं। एक तो यह कि आतंकवाद से लड़ने में सभी राजनीतिक दलों के बीच एकराय कायम हो। दूसरा यह कि लोकतांत्रिक ढांचे के अंतर्गत एक सख्त आतंकवाद विरोधी कानून बनाया जाए। क्या हमारे नेता अपनी संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठ सकेंगे?
दहशतगर्द बहुत सोच-समझकर अपने लक्ष्य का चयन कर रहे हैं। कभी वह देश की राजधानी दिल्ली में विस्फोट करते हैं, कभी हमारी आर्थिक शक्ति के केंद्र मुंबई में हमला करते हैं और कभी हमारी तकनीकी क्रांति के प्रतीक बेंगलुरु में ऐसी वारदातों को अंजाम देते हैं। धार्मिक प्रतिष्ठान भी उनके निशाने पर रहते हैं। स्पष्ट है कि वह सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़कर देश में दंगे कराना चाहते हैं।
जयपुर में भी उन्होंने मंगलवार को इसी मकसद से विस्फोट किए। वैसे जयपुर में हमले का एक और कारण वहां के पर्यटन उद्योग को नुकसान पहुंचाना भी था। आतंकियों ने भारत पर आक्रमण के अपने इरादे को कहने में कभी संकोच नहीं किया। लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख ने अपने एक भाषण में कहा था कि जेहाद कश्मीर तक सीमित नहीं रहेगा और यह तभी समाप्त होगा, जब भारत पर फिर से मुसलमानों का राज स्थापित हो जाएगा।
वर्ष २क्क्१ से अब तक कश्मीर और पूर्वोत्तर के क्षेत्रों को छोड़कर शेष भारत में ही आतंकवाद के चलते ६क्क् से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। जयपुर के बाद अब अगला निशाना कब और कहां होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसा लगता है कि देश में कोई भी स्थान, कोई भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं है। एक तरफ तो हम महाशक्ति बनने का सपना देखते हैं, सुरक्षा परिषद में सीट मांगते हैं और दूसरी तरफ आतंकवाद के सामने खुद को बेबस-लाचार पाते हैं। क्या यह एक विडंबना नहीं है। ऐसा नहीं है कि हम आतंकवाद से लड़ नहीं सकते।
पंजाब में हमारे सुरक्षा बलों ने इसे नेस्तनाबूद कर दिया। त्रिपुरा में आतंकवादी संगठनों की कमर टूट गई है। आंध्रप्रदेश नक्सलियों का गढ़ था, परंतु राज्य पुलिस और ‘ग्रेहाउन्ड’ फोर्स ने ऐसा आक्रामक रुख अपनाया कि नक्सली प्रदेश छोड़कर लगभग भाग गए हैं। अगर दृढ़ राजनैतिक संकल्प हो, आतंकवादियों से लड़ने के लिए सुरक्षा बलों को आवश्यक स्वायत्तता दी जाए, सख्त कानून हो, जिसके पकड़ में आने की संभावना से आतंकवादी दहशत में हों, तो कोई कारण नहीं कि आतंकवाद पर विजय न पाई जा सके।
-लेखक बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक हैं।