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लावारिस वाहनों का ध्यान रखें

इंदौर. जयपुर सीरियल ब्लास्ट में साइकिल के उपयोग के बाद पुलिस लावारिस वाहनों को लेकर काफी सतर्क है। सार्वजनिक स्थलों पर नियमित चेकिंग के साथ किराएदारों की जानकारी देने के लिए भी दबाव बनाया जा रहा है।

पुलिस की निगाह रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, टॉकीजों, एम.वाय. अस्पताल परिसर, शॉपिंग माल्स के पार्किग स्टैंड्स पर है जहां कई वाहन लंबे समय से पड़े सड़ रहे हैं। इनमें से कई पर तो नंबर भी नहीं। इनमें साइकिलें भी हैं। ऐसे में तत्काल पता भी नहीं चलता वाहन चोरी के हैं या किसी वारदात में प्रयुक्त किए गए हैं। दो साल पहले स्कीम-54 में एएसआई की बेटी वर्षा वर्सागड़े की हत्या का आरोपी उसकी स्कूटी ट्रैजर आईलैंड के पार्किग में छोड़ गया था।

उसके बाद पुलिस ने मॉल्स और ऐसी ही अन्य बड़ी इमारतों में पार्किग स्टैंड संचालकों को टोकन, स्लीप व रजिस्टर में एंट्री के सख्त आदेश दिए थे। इसकी जानकारी पुलिस को देने के लिए भी कहा था। हालांकि इसका पालन एक-दो महीने ही हो पाया।एक बार फिर उन्हें हर वाहन के नंबर, आने-जाने का समय नोट करने को कहा गया है। लंबे समय तक पार्किग में खड़े वाहनों की सूचना पुलिस को देने के साथ सभी टीआई को भी इस दिशा में सतर्कता बरतने का कहा है। किसी आयोजन या मेले के पार्किग स्टैंड संचालकों को भी सचेत किया है।

शहर में केवल दो बांग्लादेशी

जयपुर सीरियल ब्लास्ट में बांग्लादेशी का हाथ होने के मद्देनजर शहर में भी उनकी तलाश है। हालांकि सरकारी रिकॉर्ड में केवल दो बांग्लादेशी दर्ज हैं जो शहर में वैध रूप से रहते हैं। तीन साल पहले पुलिस ने शहर में हुई सिलसिलेवार डकैतियों में बांग्लादेशी बदमाशों को पकड़ा था जिन्हें कोर्ट से सजा भी हुई थी। वे घुसपैठ कर यहां तक पहुंचे थे। उनके कुछ साथी अब तक फरार हैं।

जयपुर ब्लास्ट के बाद पुलिस उन्हें फिर तलाश रही है। हालांकि अभी तक अनाधिकृत तौर पर बसे बांग्लादेशियों की जानकारी नहीं मिली है। एसपी अंशुमान यादव के मुताबिक पश्चिम बंगाल के मूर्ति कलाकारों, सुनारी करने वालों व अन्य मजदूरों को बांग्लादेशी कहा जाता है जिसे लेकर भ्रम होता है। वास्तव में ये पश्चिम बंगाल के हैं और कामकाज के लिए यहां बस गए हैं। कुछ साल पहले बांग्लादेश से चार-पांच लोग अधिकृत रूप से कुछ दिन के लिए यहां रहने आए थे। उसके बाद पासपोर्ट प्रक्रिया के माध्यम से दो लोग और आए जो पुलिस निगरानी में हैं।





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