लंदन/ उदयपुर. रामायण पर दिलकश रंगों से सजी 120 खास चित्रों की एक प्रदर्शनी लंदन में शुक्रवार को शुरू हुई। ये पेंटिंग 17वीं सदी की हैं और राणा जगत सिंह मेवाड़ के निजी कलेक्शन की शान रही हैं। सभी पेंटिंग उदयपुर के कोर्ट स्टूडियो में महाराणा जगत सिंह मेवाड़ द्वारा 1649 से 1653 के दरमियान बनवाई गई थीं। ब्रिटिश लाइब्रेरी द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी में प्रस्तुत अधिकांश पेंटिंगों का यह पहला सार्वजनिक प्रदर्शन है।
‘द रामायण: लव एंड वेलर इन इंडियाज ग्रेट एपिक’ नाम की यह प्रदर्शनी 15 सितंबर तक चलेगी। प्रदर्शनी में रखी गई पेंटिंगों में विविध संस्कृतियों और देशों में रामायण की महागाथा के वर्णन को उकेरा गया है। प्रदर्शनी में भारत ही नहीं दक्षिण पूर्व (बाली, जावा) की रामायण कथाओं के ऑडियो टेप भी रखे गए हैं। विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम, ब्रिटिश म्यूजियम और एशमोलियन म्यूजियम के अलावा कुछ शेडो पपेट और हॉर्निमन म्यूजियम की नृत्य पोशाकें भी रखी गई हैं।
मेवाड़ के स्वर्णकाल के चित्र
जगत¨सह का काल (1649-53 ई.) चित्रकला की दृष्टि से मेवाड़ कलम का स्वर्णकाल कहा जाता है। इस काल में आर्षरामायण सहित गीतगोविंद आदि पौराणिक आख्यानों और रागमाला पर चित्रों की सीरिज बनी। ..शेष पेज 13 पर
यह संयोग ही है कि इन चित्रों में मुसलमान चितेरों ने बहुत योगदान किया, अपना नाम भी इन चित्रों पर अंकित किया। पुराविद् खलील तनवीर मानते हैं कि ये सब चित्र साहबदीन की परंपरा के हैं और ब्रिटिश संग्रहालय के चित्र मनोहर नामक चित्रकार के हैं और वह संभवत: साहबदीन का पुत्र ही था।
मालवा स्कूल का प्रभाव
इन चित्रों पर मालवा स्कूल का पूरा प्रभाव है। प्रसिद्ध कला समीक्षक काल खण्डाला की तरह तनवीर भी मानते हैं कि अक़बर के मांडू पर अधिकार के बाद वहां से मेवाड़ की शरण आए बाज बहादुर (रानी रूपमती प्रसंग वाला) के साथ कुछ चित्रकार भी मेवाड़ आ गए, जिन्होंने चावंड में चित्रों की परंपरा शुरू की। बाद में चावंड के रागमाला के चित्र चावंड स्कूल या मेवाड़ कलम के नाम से ख्यात हुए।
बहुत बिखरे-बिखरे हैं चित्र
महाराणा जगतसिंह कालीन चित्र बहुत बिखरे हुए हैं। उदयपुर के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में अरण्यकांड के 26 चित्र हैं जिन पर मनोहर श्रीमाली ने शोध किया है।
ब्रिटिश लाइब्रेरी, बोस्टन म्यूजियम, जोधपुर दरबार लाइब्रेरी में भी इनका संग्रह है। ये चित्र बहुत दुर्लभ हैं और उन पर विशेष अध्ययन भी शेष है। संभवत: ये अंग्रेजों के काल में इंग्लैंड ले जाए गए।