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उल्फत बाजवा नहीं रहे

जालंधर/लुधियाना. ‘जाग पेयां हां पत्तयां दी खड़ खड़ दे नाल, मैं वी इक दिन झड़ जाणा पतझड़ दे नाल.’ सारे जहां को अपना कहने वाले और दुनिया के हर मजहब व देश को अपना बताने वाले उल्फत बाजवा शुक्रवार को इस दुनिया से कूच कर गए। इस उस्ताद शायर ने शुक्रवार शाम 9.35 बजे यहां के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली।

तन्हा जिंदगी गुजार रहे 68 वर्षीय उल्फत को तबीयत बिगड़ने पर मकान मालिक ने अस्पताल में भर्ती कराया था, जहां ब्रेन हैम्रेज से उनका निधन हो गया। उनका संस्कार शनिवार सुबह होगा। अपनी किताब ‘सारा जहां मेरा’ के जरिए उन्होंने दुनियाभर को अमन का संदेश दिया। उल्फत ने ज्यादा समय तन्हाई में गुजारा। आखिरी पलों में भी वे तन्हा ही थे।

उल्फत बाजवा नहीं..
उनकी पत्नी और बेटा परिवार सहित कैनेडा में रहते हैं। जालंधर के गांव लम्मा पिंड में पैदा हुए उल्फत बाजवा ने अपना जीवन संघर्ष में गुजारा और इसे वह अपनी शायरी के जरिए बयान करते रहे। उनका असली नाम मिलखा सिंह था।

पंजाबी के साथ ही उर्दू शायरी में भी उनका ऊंचा मुकाम है। पंजाबी टीचर बन उन्होंने बच्चों को मां बोली का महत्व समझाया तो उल्फत बाजवा बन मां बोली की सेवा करते हुए उसकी झोली में वो अनमोल शायरी संजोयी जिसके मोतियों की चमक आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

इसका प्रमाण उनके लिखे इस शे’र ‘सीस जे तली ते टिकाउंदे तां इंकलाब आउंदा, ए पैरां च सीस धरदे ने एन्हां लोकां नू की कहिए.’ से मिलता है। अपने शे’र ‘मैं तुर जाणा है दुनिया तों है इस गल्ल दा पता मैनूं, करां ओह कम्म के रो-रो के करे दुनिया विदा मैनूं.’ को सच साबित करते हुए उल्फत आखिर इस जहां को कभी न भरे जा सकने वाला शून्य दे अलविदा कह गए।





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