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अध्यात्म योग से सिद्धार्थ बनें तथागत बुद्ध

पर्व प्रसंग.budha भाग्येश व धर्मेश गुरु, पंचमेश मंगल व लग्नेश चंद्रमा के योग व दृष्टि से सिद्धार्थ भगवान् बुद्ध कहलाए थे। भारत में तथागत का आविर्भाव निश्चित ही एक युग प्रवर्तक घटना है। उनका जन्म और कर्म दोनों ही दिव्य हैं। प्रारंभिक पुराणों ने उन्हें परंपरा के विपरीत नए मत व मार्ग का प्रवर्तक कहा जबकि उत्तरवर्ती पुराणों में अवतारवाद का प्रवर्तन हो चुका था। वे विष्णु के 23वें अवतार के रूप में मान्य हुए।

सिद्धार्थ का जन्म 563 ईपू. कपिलवस्तु के पास लुंबिनी वर्तमान रुम्मनदेई में क्षत्रिय कुल में हुआ था। पिता शुद्धोधन और माता का नाम महामाया था। सोलह साल की उम्र में वे यशोधरा के साथ वैवाहिक बंधन में बंधे। एक बार नगर भ्रमण के दौरान सिद्धार्थ ने वृद्ध, रोगी, मृतक व संन्यासी को देखा। जिज्ञासा से उन्होंने अपने रथ के सारथी से पूछा व जाना कि सभी प्राणियों को वृद्ध होना है।

शरीर को रोग जरूर होगा, जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी। दुखों से निवृत्ति के लिए लोग संन्यास ग्रहण करते हैं। जीवन के इस सत्य को जानकर उन्हें वैराग्य हो गया और 29 साल की आयु में पुत्र व पत्नी को निद्रावस्था में छोड़कर परम सत्य की खोज में निकल पड़े।

इसके लिए उन्होंने कठिन तप किया। महावृक्ष के नीचे आठ दिन तक समाधिवस्था में वैशाख की पूर्णिमा को उन्हें बुद्धत्व यानी सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। यहीं से सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कहलाए। उन्होंने दुनिया को संदेश दिया कि यह संसार दु:खमय है, दुख का कारण तृष्णा है। तृष्णाओं पर विजय पाना ही दुखों की समाप्ति है। दुखों की समाप्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करें। उनकी शिक्षाएं बौद्धधर्म के रूप में कई देशों के निवासियों की आदर्श बनी हुई हैं।

बुद्ध की कुंडली में देखा जाए तो प्रवज्या योग था। सूर्य, शनि, राहु व राहु से अधिष्ठित राशि का स्वामी ग्रह विच्छेदकारक या विरक्त कर देने वाला ग्रह है। लग्न कुंडली में द्वितीय, चतुर्थ व द्वादश भाव विरक्ति से संबंध रखते हैं। ये भाव व इनके स्वामी यदि इन विच्छेदकारक ग्रहों के प्रभाव में होंगे तो जातक संसार से विरक्त हो जाएगा।

सिद्धार्थ की जन्म कुंडली में सूर्य व शनि दशम भाव में स्थित हैं जिनकी मन के अधिष्ठाता ग्रह चंद्रमा व चतुर्थ भाव पर सीधी दृष्टि है। राहु द्वादश भाव में स्थित है जिसकी पंचम दृष्टि चतुर्थ भाव व चंद्रमा पर है। द्वितीय भाव पर मोक्षकारक केतु की नवम दृष्टि है। विवेक शक्ति का स्वामी बुध, राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से पूर्ण विच्छेदकारक ग्रह हैं। अत: सिद्धार्थ राजवैभव को छोड़कर संन्यासी हो गए।

दिव्य आध्यात्मिक योग : यदि विरक्तकारी ग्रहों के साथ ही कुंडली में लग्न, पंचम व नवम भाव के भावेशों का संयोग हो जाए तो जातक उच्च कोटि का महात्मा, ज्ञानी, संत, ईश्वर भक्त और दिव्य अलौकिक शक्तियों से संपन्न होता है। धर्मेश व भाग्येश गुरु, पंचमेश, मंगल व लग्नेश चंद्रमा के योग व दृष्टि संबंध प्रबल दिव्य आध्यात्मिक योग बनने से सिद्धार्थ भगवान बुद्ध के रूप में ख्यात हुए।





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