Astrology
Astro Speak Astro Speak मुहूर्त चर्चा.
सैर-सपाटा जिंदगी में ताजगी लाता है इसलिए मौका मिलते ही लोग घूमने निकल पड़ते हैं। कुछ लोग धार्मिक, ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक स्थलों के बारे में जानने की सहज आकांक्षा लेकर भी घूमते हैं। यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति की यात्रा बाधा रहित और कष्ट रहित हो।
यात्रा सुखद हो, घटना-दुर्घटना नहीं हो, स्वास्थ्य में लाभकारी हो, आर्थिक हानि न हो इस दृष्टि से ज्योतिष शास्त्र में यात्रा के लिए शुभ मुहूर्त प्रतिपादित किए गए हैं। शुभ मुहूर्त में आरंभ की गई यात्रा एक ओर हमारे आत्मबल में वृद्धि करती है वहीं यात्रा में सुख तथा आनंद के साथ निश्चिंतता का भाव उत्पन्न होता है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, तिथि, वार तथा लग्न के संयोग और यात्रा के समय इनकी शुभता को निश्चित करके यात्रा, भ्रमण, के मुहूर्त निकाले जाते हैं।
सूर्य विचार : सूर्य एक राशि में एक माह तक भ्रमण करता है अत: जब मेष, सिंह तथा धनु राशि में सूर्य हो तब यात्रा करना अति शुभ माना गया है। वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर तथा कुंभ के सूर्य में यात्रा करना मध्यम माना गया है किंतु कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशि में सूर्य हो तब यात्रा करना शुभ नहीं है।
चंद्र विचार : यात्रा के समय चंद्र स्वयं की राशि कर्क में अथवा इसकी उच्च राशि वृषभ में हो तो यात्रा उत्तम एवं सुखद होती है।
यात्राकर्ता की जन्म राशि से प्रथम चंद्र पुष्टि प्रदान करता है, द्वितीय चंद्र यात्रा में धन प्राप्त करवाता है, तृतीय चंद्र राज्य प्रतिष्ठा तथा सम्मान प्रदान करता है, चतुर्थ चंद्र कलह का कारक है। यात्रा के समय जातक को पांचवां चंद्र बुद्धिनाशक, षष्ठम् धन एवं धान्य की प्राप्ति का कारक, सप्तम चंद्र संतोषकर्ता, अष्टम प्राण घातक, नवम कलह तथा तनावकर्ता, दशम चंद्र रोजगार-व्यवसाय प्रदान करने वाला, एकादश विजय प्रदान करने वाला तथा द्वादश चंद्र मृत्यु, व्ययकर्ता योग निर्मित करता है।
चंद्रवास : यात्रा के समय चंद्र का वास किस दिशा में है इसका निश्चय करके ही प्रस्थान करना चाहिए। मेष, सिंह तथा धनु राशि में स्थित चंद्र का वास पूर्व दिशा में होता है। वृषभ, कन्या तथा मकर राशि में स्थित चंद्र का वास दक्षिण दिशा में होता है। मिथुन, तुला तथा कुंभ राशि में स्थित चंद्र का वास पश्चिम दिशा में होता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशि में स्थित चंद्र का वास उत्तर दिशा में होता है। अत: जिस दिशा में गमन करना हो, उस दिन चंद्र का वास किस दिशा में, यह ज्ञात करना चाहिए क्योंकि सम्मुखे अर्थलाभाय दक्षिणो सुख सम्पदाम्।
पृष्टत: प्राणनाशाय वामे चन्द्र धन क्षय:॥
अर्थात यात्रा के समय सम्मुख में स्थित चंद्र अर्थ लाभ एवं शुभ फल प्रदान करता है। गन्तव्य की दिशा में जाने पर यदि दाएं हाथ की दिशा में चंद्र स्थित है तो यह सुख तथा संपत्ति प्राप्ति के योग निर्मित करता है, यात्रा करते समय पृष्ठ भाग पर स्थित चंद्र मृत्यु का कारण बनता है तथा बाएं हाथ की दिशा में स्थित चंद्र धन की हानि करवाता है।
नक्षत्र विचार : तिथि, वार, चंद्र एवं नक्षत्र का संयोग घात का निर्धारण करते हैं अत: यात्रा करते समय घात चंद्र की स्थिति को त्यागना चाहिए। इसी प्रकार शौनक ऋषि द्वारा प्रतिपादित कालचंद्र का विचार करके ही यात्रा हेतु प्रस्थान करना चाहिए।
दिशा-शूल विचार : शनिवार तथा सोमवार को पूर्व दिशा में, गुरुवार को दक्षिण दिशा में, रविवार तथा शुक्रवार को पश्चिम में तथा बुधवार एवं मंगलवार को उत्तर दिशा में शूल रहता है। अत: यात्रा के समय उक्त वारों के लिए निर्धारित दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए। किंतु रविवार को घी, सोमवार को दूध, मंगलवार को गुड़, बुधवार को तिल, गुरुवार को दही, शुक्रवार को जौ तथा शनिवार को उड़द का सेवन करके यात्रा करने से यात्रा में कष्ट नहीं रहता है।
राहुकाल विचार : रविवार, गुरुवार को पूर्व दिशा में, सोमवार तथा शुक्रवार को दक्षिण दिशा में, मंगलवार को पश्चिम दिशा में, शनिवार को उत्तर दिशा में यात्रा करने पर काल राहु बाएं तथा पृष्ठ भाग पर रहता है अत: निर्देशित दिन एवं दिशा के अनुसार यात्रा करने पर समस्त कार्यो में सिद्धि प्राप्त होती है।
यात्रा हेतु अभिजित मुहूर्त विचार : यात्रा के समय यदि शुभ मुहूर्त उपलब्ध न हो तो प्रतिदिन दिन के मध्य भाग से 24 मिनट पहले तथा 24 मिनट बाद में अभिजित मुहूर्त रहता है, इसमें प्रस्थान करने से समस्त कार्यो में सफलताएं प्राप्त होती है। इसी प्रकार सूर्योदय से 2 घंटे तक एवं ब्रrाबेला में यात्रा प्रारंभ करने से भी कुयोग टल जाते हैं तथा शुभ फल प्राप्त होते हैं।
ग्रहों के अस्त का दोष : गुरु, शुक्र तथा चंद्र के अस्त होने पर भी यात्रा करना शुभ नहीं है।
यात्रा में लग्न विचार : मेष, कर्क, तुला तथा मकर चर लग्नों में तथा मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन द्विस्वभाव लग्नों में यात्रा करने से यात्रा सफल एवं सिद्ध होती है जबकि वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुंभ स्थिर लग्नों में यात्रा नहीं करनी चाहिए।
शुभ शकुन : यात्रा के लिए प्रस्थान करते समय हाथी, घोड़ा, फल, अन्न, ब्राrाण, दूध, दही, गाय, सरसों, कमल पुष्प, वस्त्र, नगाड़ा, मोर, नीलकंठ, नेवला, बंधा पशु, शुभ वचन, पुष्प, गन्ना, पानी से भरा कलश, छत्र, मिट्टी, कन्या, रत्न, काला बैल, पुत्र सहित स्त्री, जलती हुई अग्नि, दर्पण, धुले वस्त्र, धोबी, मछली, शवयात्रा, पालकी, झंडा, शहद, हथियार, भारद्वाज पक्षी, मैना, वेदध्वनि, मांगलिक गीत आदि मिलते हैं तो यात्रा शुभ कहलाती है। जबकि बिल्ली, औषधि, लकड़ी, कोयला, तेल, हड्डियां, सर्प, रोगी मनुष्य, भैंस, गदर्भ का स्वर, मुंडन किए हुए आदमी आदि मिलने को यात्रा के लिए अशुभ माना गया है।
अपशकुन परिहार : यात्रा के समय यदि कोई अपशकुन होता है तो ग्यारह श्वास लेकर तथा इष्टदेव का स्मरण करके चलना चाहिए। दूसरी बार अपशकुन हो तो सोलह बार श्वास लेकर भगवान का स्मरण करके चले, किंतु तीसरी बार अपशकुन हो तो यात्रा को निरस्त करना चाहिए।