आखरांजलि
सामाजिक सरोकारों को अक्स में उतारने वाले नाटककार विजय तेंडुलकर का चला जाना उस आवाज के गुम होने जैसा है जो हमेशा अन्याय और कुरीतियों के खिलाफ उठती रही है। वे नाटक के भविष्य पर कभी चिंतित भी नहीं दिखे। कोई सवाल पूछता तो भी सहज उत्तर देते कि नाटक कयामत की रात तक जारी रहेंगे और लिखे जाते रहेंगे। उनके हर लफ्ज में वजन और गुड़ का जायका था।
भारत में नाटक लेखन विधा पर उनका कहना था कि नाटक लिखना आसान काम नहीं है। उनकी इस टिप्पणी पर पंजाब के प्रसिद्ध नाटककार गुरशरण सिंह भी कहते हैं कि नाटक वही लिख सकता है जो आंखें खुली रखता है। बकौल गुरशरण, ‘विजय तेंड़ुलकर जो लिखते हैं उसमें आग होती है। उन्होंने भारत में नाटकों को दोबारा जीवंत किया है।’ ऐसा ही कुछ कहना है पंजाब के ख्यात कवि और नाटककार सुरजीत पातर। वे कहते हैं कि तेंडुलकर ने आम आंखों से वह सब देखकर लिखा है जो हमेशा लोग देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। उनका चले जाना बहुत बड़ी क्षति है।
भारत में नाटक विधा पर तेंडुलकर अकसर कहते थे कि संभावनाएं कभी समाप्त नहीं होती हैं। वे आशावादी थे और संभावनाएं तलाशते रहते थे। यही कारण था कि उन्होंने भारतीय रंगमंच को नई दिशा दी। अपने पात्रों के विषय में वे कहते थे कि किसी भी पात्र को जन्म देने से पहले वे उसकी जीवनशैली को अपनाते थे। पात्र क्या सोचता है और उसके दिल में क्या चल रहा है वे हर पहलु पर गंभीरता से विचार करते और उसके बाद ही कागज पर उसे उतारते। जब उनसे एक बाद पूछा गया कि इस क्षेत्र में नए चेहरे नहीं आ रहे हैं तो वे मुस्करा कर कहते थे ‘थोड़ा इंतजार करो’।
सृजन और कला की ऐसी कोई विधा नहीं बची थी, जो विजय तेंडुलकर को स्पर्श करके न गुजरी हो और अभिव्यक्ति का ऐसा कोई आयाम नहीं जिसे ‘जीत’ सकी हो। एक बहुआयामी व्यक्तित्व का यूं चले जाना रचनात्मकता के उस अयन को सूना कर देता है, जहां से खड़े होकर हम उनके इंद्रधनुषी सृजन को निहारा करते थे।
‘घासीराम कोतवाल’ उनकी कालजयी रचना है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। इस अद्भुत रचना को जन्म देकर वे नाट्य जगत के मील के पत्थर बन गए। फिल्मों में भी उन्होंने योगदान दिया। ‘अर्धसत्य’ और ‘आक्रोश’ में उन्होंने संवाद दिए हैं। दोनों फिल्मों के संवाद दिल को हिला देने वाले हैं।
आंदोलन से भी जुड़े
6 जनवरी 1928 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ब्राrाण परिवार में जन्मे विजय तेंडुलकर को विरासत में साहित्य का सौंधा अनुकूल वातावरण मिला। कब नन्हें हाथों ने कलम थाम ली, उन्हें भी नहीं पता था। भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई।
लेखन और विवाद
संघर्ष के शुरुआती दिनों में वे ‘मुंबइया चाल’ में बटोरे सृजनबीज बरसों मराठी नाटकों में अंकुरित होते दिखाई दिए। 1961 में उनका लिखा नाटक ‘गिद्ध’ खासा विवादास्पद रहा। ‘ढाई पन्ने’, ‘शान्तता कोर्ट चालू आहे’, ‘घासीराम कोतवाल’ ने’ मराठी थियेटर को नवीन ऊंचाइयां दी। नए प्रयोग, नई चुनौतियों से वे कभी नहीं घबराए, बल्कि हर बार उनके लिखे नाटकों में मौलिकता का अनोखा पुट होता था। सत्तर के दशक में उनके कुछ नाटकों को विरोध भी झेलना पड़ा लेकिन वास्तविकता से जुड़े इन नाटकों का मंचन आज भी होना उनकी स्वीकार्यता का प्रमाण है।
सम्मान
उन्हें 1971 में पद्यभूषण, फिल्म फेयर अवॉर्ड (1956, 69, 72), संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड (1971), ‘फिल्म फेयर अवॉर्ड (1980, 1999) एवं महाराष्ट्र गौरव (1999) एवं महाराष्ट्र गौरव (1999) जैसे सम्मानजनक पुरस्कारों से नवाजा गया। तेंदुलकर को श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंथन’ की पटकथा के लिए वर्ष 1977 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। उनकी लिखी पटकथा वाली कई कलात्मक फिल्मों ने समीक्षकों पर गहरी छाप छोड़ी इन फिल्मों में ‘अर्धसत्य’, निशांत, ‘आक्रोश’ शामिल हैं।
6 वर्ष की आयु में लेखन
6 वर्ष की कोमल उम्र में उन्होंने कहानी लिख डाली और 80 वर्ष की आयुं तक असंख्य यादगार रचनाएं कला-जगत को दे डाली उनका यूं चले जाना आंखों के पोर को भिगो देता है।