खुशी, सुख, प्रसन्नता, हर्ष, उल्लास ये सब एक ही परिवार के सदस्य हैं। अनादि काल से मनुष्य सुख की खोज में भटक रहा है और वह सुख सदा उससे दूर भागता रहा है। आजकल मनुष्य की खुशहाली के बारे में मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और राजनीतिज्ञ भी ¨चतित हैं, क्योंकि इक्कीसवीं सदी एक बेचैन सदी बन गई है। इसमें एक अजीब सा आलम है। जो आज तक खुशी के साधन माने जाते थे वे बहुत अधिक उपलब्ध हैं, साधनों-सुविधाओं के अंबार लगे हैं, प्रगतिशील देश भी विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से टक्कर लेने लगे हैं, लेकिन इस उफान के बावजूद एक सवाल सबके दिल में कुरेद रहा है कि क्या आधुनिक मनुष्य सचमुच खुश है? क्या वह उसके पूर्वजों से ज्यादा सुखी है? वह खुश दिखाई जरूर देता है, लेकिन खुश दिखाई देने और खुश होने में जमीन-आसमान का फर्क होता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर रिचर्ड ईस्टरलिन इस ख्याल से इतने विचलित हुए कि उन्होंने इसी विषय को लेकर एक वृहद अनुसंधान किया। इसके तहत उन्होंने विकसित और प्रगतिशील देशों के लगभग १६ हजार नागरिकों से कुछ सवाल पूछे। इसके नतीजे बेहद आश्चर्यजनक थे। उन्होंने पाया कि आर्थिक समृद्धि और मनुष्य की प्रसन्नता के अनुपात में कोई तालमेल नहीं है। हां, कुछ हद तक ही आर्थिक समृद्धि खुशी देती है। किसी के पास कार नहीं हो तो उसे पा लेना निश्चय ही खुशी का कारण बनता है।
किराए के मकान में रहनेवाले के लिए खुद का मकान हासिल करना एक खुशी की लहर पैदा करता है, लेकिन वहीं उसकी सीमा आ जाती है। एक बार ये भौतिक चीजें इकट्ठी हो जाएं तो उसके बाद खुशी का सफर वहीं रुक जाता है। एक मकान के दो हो जाने से उनकी खुशी में कोई बडा इजाफा नहीं होता। तनख्वाह अगर दुगुनी हो जाए तो उससे उनकी खुशी दोगुनी नहीं होती। उल्टे अमीरों की ¨जदगी में ऊब पैदा होती है। उनका दम घुटने लगता है।
आज विकसित देशों की यही हालत है। अपने साफ - सुथरे सुंदर घरों में बैठे टीवी से चिपके लोग निहायत बोरियत और अवसाद में डूबे जा रहे हैं। जीवन में कुछ उत्तेजना चाहिए, कोई चुनौती, कोई थ्रिल, कोई मानवीय ऊष्मा चाहिए जो समाज में सर्वथा नदारद है। विकसित समाज की यही बीमारी अब भारत के नव संपन्न वर्ग में पनप रही है। संपन्नता और उदासी का यह जो गठबंधन है उसे ‘इस्टरलिन विरोधाभास‘ कहा जाता है।
क्योंकि यह रिचर्ड इस्टरलिन की बडी क्रांतिकारी खोज है। तमाम खुशी के साधनों के बावजूद लोग उसी मात्रा में खुश नहीं होते क्योंकि उनकी अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती हैं। अपेक्षाएं छेद बने हुए पात्र जैसी होती हैं, कितना ही कुछ डालो, सब कुछ बह जाता है। पात्र कभी भरता ही नहीं।
इस्टरलिन की तरह एक और सुखवादी इजरायली युवक है ताल-बेन -शहर जो अब हार्वर्ड विश्वविद्यालय में खुशी के गुर सिखाकर छात्रों को अपनी ओर खींच रहा है। वह इजरायल के एयर फोर्स में काम करता था, अच्छा खिलाड़ी था, भरपूर पैसे कमाता था लेकिन वह खुश नहीं था। वह हमेशा सोचता, कुछ और पैसे, थोड़ा और नाम, थोड़े और पुरस्कार मिलने पर मैं खुश होऊँगा। लेकिन यह मकाम हासिल करने के बावजूद जब खुशी उसके साथ आंख मिचौली खेलती रही तो उसने गहरे पानी पैठने की सोची। उसने पूरब के अध्यात्म में गोता लगाया, सकारात्मक मनोविज्ञान का अध्ययन किया और अपने भीतर मचल रहे कुछ सवालों के जवाब पाने में कामयाब हुआ।
उसका मानना है कि बुद्धिवाद के अतिशय विकास से शिक्षित आदमी की सोच नकारात्मक हो गई है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली नकारात्मक बुद्धि को बढावा देती है। फलत: हम चीजों के अंधेरे पहलुओं को देखने के आदी हो जाते हैं। यदि खुशी को अनुभव करना हो तो इस नकारात्मक सोच को आमूल बदलना होगा। ओशो से यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता था कि आदमी सुख की खोज में भटकता है लेकिन उसके हाथ दुख ही क्यों आता है? ओशो हमारी सुख की लालसा पर कुठाराघात करते हैं, ‘मनुष्य इसीलिए दुखी है क्योंकि सुखी रहना चाहता है।
यह बिलकुल असंगत लगता है, लेकिन यही मूल कारण है। सुख की इच्छा को छोड़ना पड़ेगा-तब कोई भी तुम्हें दुखी नहीं कर सकता। लेकिन सुख की इच्छा दु:ख क्यों लाती है? क्योंकि जिस क्षण तुम सुख चाहते हो, तुम वर्तमान से हट जाते हो, जो अस्तित्वगत है उससे दूर चले जाते हो, तुम भविष्य की ओर चले जाते हो-जो अभी कहीं मौजूद ही नहीं है, जो अभी तक नहीं आया। तुम किसी स्वप्नलोक में चले गए हो। सुख की तुम्हारी चाहत एक ऐसे स्वप्न की भांति है जो वास्तविक नहीं है। हकीकत है उदासी और सपने देख रहे हैं प्रसन्नता के। यही भूल है। तुम गलत ट्रेन में बैठ गए।‘सुख या खुशी के पीछे अंधों की भांति भागने से पहले एक मूलमंत्र गांठ बांध लें कि जीवन छोटी-छोटी बातों से बना है, बड़ी-बड़ी कल्पनाओं और योजनाओं से नही।
खुशी की खातिर
छोटी-छोटी चीजों से खुश होना सीखें। जैसे बारिश के बाद निकली धूप, या मासूम बच्चे की मुस्कान, या सुबह की पहली चाय की प्याली से निकलती भाप.. खुश होने के लिए क्या ये लम्हे पर्याप्त नहीं हैं? इनको नजरअंदाज न करें, इन्हें अपने दिल में संजोएं ताकि दिल को खुशी संग्रहित करने की आदत पड़े।
जब भी खुशी की तरंग उठे उसे वाणी दें, शब्दों से अभिव्यक्त करें। जैसे-’ यह गीली धूप कितनी सुहानी है!’ ‘चाय की भाप मुझे पुलकित कर रही है।’ अमूर्त भाव को मूर्त बनाने पर वह ठोस बनता है। छोटी-छोटी खुशियां संजोने के बाद जब बड़ी खुशी आएगी तब आप उसे सम्हालने में सक्षम हो जाएंगे।
खुशी हमेशा इस क्षण यानी वर्तमान में होती है। इसलिए पहली बात, सुख के सपने देखना बंद करें। हमेशा अभी और यहीं वर्तमान में रहिए। जैसी भी स्थिति है, अभी वर्तमान में ही बने रहिए, और फिर देखिए एक बहुमूल्य बोध आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। आपका दु:ख कम होता जाएगा और खुशी के पल बढ़ते जाएंगे।
हर रोज पांच नए कृत्य कीजिए, और फिर देखिए आपके हृदय में कैसी खुशी महकती है। ये काम बिलकुल छोटे हो सकते हैं जैसे सड़क पर खड़े भिखारी से उसका नाम पूछिए, हालचाल पूछिए। क्या आपने कभी सोचा कि भिखारी का भी कोई नाम होता है? इस छोटे से कृत्य से आप अधिक मानवीय महसूस करेंगे। किसी अजनबी को हंसकर नमस्ते करिए। और उसकी सुखद हैरानी से आल्हादित होइए।
घर या दफ्तर में प्रवेश करने से पहले अपने दुखों की गठरी बांधकर उसे दरवाजे पर छोड़िए। फिर अंदर प्रवेश करिए। यह कृत्य प्रतीकात्मक ही सही, इससे आपकी भावदशा बदल जाएगी। बाहर जाते समय सोचिए, इस गठरी की मुझे जरूरत है या नहीं। अगर नहीं है तो उसे मत उठाइये।
खुशी की अनुभूति एक रहस्य है। उसे न पैदा किया जा सकता है न खरीदा जा सकता है। आप दिल के द्वार खुले रखिए, अकस्मात उसमें कुछ अमृत कण बरसेंगे। वही है अस्तित्व का प्रसाद जिसे लोग खुशी कहते हैं।
(लेखिका ओशो टाइम्स की संपादक हैं)
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