मानसिक रोग की ही एक किस्म है-सीजनल इफेक्टिव डिस्आर्डर। इस पर 1984 से शोध आरंभ हुए हैं, लेकिन दो हजार साल पहले अरस्तू जैसे दार्शनिक भी इस पर अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं। इस रोग का संबंध प्रकाश यानी रोशनी से है। हर दिन कितने घंटे आपको प्राकृतिक प्रकाश नसीब होता है या नहीं होता है, इसकी मात्रा पर निर्भर है कि आपमें सेड की कितनी संभावना पैदा होगी। शायद इसीलिए हमारे ऋषियों ने अंधकार से प्रकाश की ओर गमन करने की प्रेरणा और आशीर्वाद प्रदान किया। यह अनुवांशिक भी है। यदि माता-पिता में से किसी को भी है तो बच्चों में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है।
यह समस्या पतझड़ के मौसम के साथ शुरू होती है और सर्दी में जारी रहते हुए बसंत ऋतु में खत्म हो जाती है। मोटे तौर पर नवंबर से मार्च के बीच इसका मौसम जोर पर होता है। मुझे लगता है कि भारत जैसे देश में जुलाई से मार्च के बीच कई महत्वपूर्ण तीज-त्यौहार रचे गए हैं। जैसे रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली, संक्रांति, होली आदि। यह अनायास नहीं है। इसके मनोवैज्ञानिक कारण हैं। कारण यही है कि समय के इस खंड में इस रोग की सर्वाधिक संभावनाएं होती हैं। इस रोग में व्यक्ति का मूड बदलने लगता है, उदासी भीतर ही भीतर पैर पसारती मालूम पड़ती है, शरीर में ऊर्जाहीनता का अनुभव होता है, चिंता में बढ़ोतरी होने लगती है और चिड़चिड़ापन आ जाता है।
इस प्रकार के अवसाद में आश्चर्यजनक रूप से काबरेहाइड्रेट्स वाले खाद्य पदार्थो के सेवन की इच्छा बलवती होने लगती है। व्यक्ति सामान्य से ज्यादा खुराक लेने लगता है और इससे उसका वजन भी बढ़ जाता है। जबकि दूसरे अवसादों में ऐसा नहीं होता। एक और भिन्नता है और वह यह कि इसमें व्यक्ति को नींद भरपूर आने लगती है। देखा गया है कि जब किशोर अवस्था बीतती है और वयस्क होने की ओर कदम बढ़ते हैं, उम्र के ऐसे मोड़ पर यह रोग जोर से दस्तक देता है। कुछ हद तक बच्चों में भी इसे देखा जा सकता है।
इससे बचाव के लिए बच्चों को लंबे समय तक टीवी और इंटरनेट से बंधे नहीं रहना चाहिए। क्योंकि उनका अधिक समय स्कूल, कोचिंग आदि में वैसे ही कैद रहता है। उनका प्रकृति से संपर्क न्यूनतम हो रहा है, जो कि इस प्रकार के अवसाद के अनुकूल स्थिति है। बड़ों को कोई न कोई रचनात्मक शौक रखना चाहिए और खेलकूद या अध्ययन आदि नियमित रखना चाहिए। उत्सव की मानसिकता बनानी चाहिए। जब भी मौका मिले घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर प्रकृति का आनंद लेना चाहिए।
(लेखक जाने-माने नैदानिक मनोवैज्ञानिक हैं।)
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