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उच्च शिक्षा विस्तार की चुनावी पहल

संपादकीय.कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों सहित उच्च शिक्षण संस्थान खोलने की घोषणा के बाद अब देश के 373 जिलों में डिग्री कॉलेज खोलने की प्रधानमंत्री की पहल देश को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान दिलाने वाली हो सकती है। लेकिन इस योजना पर अमल करने की ताबड़तोड़ शैली केंद्र सरकार की नीयत पर भरोसा करने से रोकती है। ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के विस्तार का चुनावी लाभ लेने की तैयारी में है।

इसी के चलते 31 जुलाई तक हर डिग्री कॉलेज के लिए वित्तीय मंजूरी देने की बात भी पीएमओ कर रहा है। लोकतंत्र में सरकारों द्वारा विकास कार्यो को भी राजनीतिक नफा-नुकसान की दृष्टि से देखना स्वाभाविक है। फिर जब इसमें चुनावी लाभ पाने की लालसा भी शामिल हो जाए तो परिणाम अनिश्चित हो जाते हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, कृषि, गरीबी जैसे मुद्दे चुनाव के एजेंडे में शामिल हों, तो यह अच्छी बात है लेकिन चुनावी लाभ के लिए इन मुद्दों को भुनाने से इसका वांछित लाभ लोगों तक नहीं पहुंचता है। केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के विस्तार की योजनाओं पर मुहर लगाकर वाहवाही तो लूट सकती है परंतु विश्व में अग्रणी स्थान बनाने का सपना साकार नहीं हो सकता। देश में उच्च शिक्षा का स्तर वैसे भी दयनीय है, विश्वविद्यालय शिक्षा देने के नहीं वरन डिग्री बांटने की दुकानों में तब्दील हो रहे हैं। ऐसे में बिना ढांचागत सुविधाओं का विकास किए डिग्री कॉलेज खोलने से उनकी गुणवत्ता ही प्रभावित होगी।

कुछ साल पहले जिन नए केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा की गई थी, उनका स्वरूप ही आज तक सामने नहीं आया है। डिग्री कॉलेजों के लिए एक-तिहाई धन देकर केंद्र यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि समयबद्ध कार्यक्रम के तहत ये कॉलेज खुल भी जाएंगे। इसके लिए राज्यों की सहमति व भागीदारी जरूरी है। देश की समूची शिक्षा व्यवस्था का कबाड़ा तदर्थवाद ने ही किया है और केंद्र की यह पहल उसी तदर्थवाद का विस्तार करती है। अब तक का अनुभव यही बताता है कि चुनाव के ठीक पहले सरकारें ताबड़तोड़ घोषणाएं करती हैं, लेकिन सुनियोजित कार्ययोजनाओं के अभाव में वे मूर्तरूप नहीं ले पातीं।

यह शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी जैसे मुद्दों का चुनावी दोहन और आमजनता के साथ छलावा साबित होता है। केंद्र सरकार यदि उच्च शिक्षा के विस्तार के प्रति सचमुच गंभीर है तो इसके लिए चुनाव का मोह छोड़कर संजीदगी से प्रयास किया जाना चाहिए, जिससे विस्तार के साथ-साथ गुणवत्ता भी उच्च शिक्षा का आधार बने।





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