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गुर्जर आंदोलन का पटाक्षेप

पिछले छब्बीस दिनों से जनजाति में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनकारियों व सरकार में बनी सहमति से सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश में राहत महसूस की जा रही है।

समझौते के तहत राज्य सरकार एक विशेष वर्ग बनाकर उसमें गुर्जर, बंजारा, रायका व गाडिया लुहार जातियों को पांच प्रतिशत आरक्षण देगी। इस सहमति में यह ध्यान रखने की पूरी कोशिश की गई है कि दूसरे वर्गो की नाराजगी सरकार को न झेलनी पड़े, लेकिन इस आंदोलन ने ऐसे कई सवालों को जन्म दिया है, जिनके उत्तर ढूंढ़ने में यदि सावधानी नहीं बरती गई, तो देश में ऐसी और स्थितियों को बनने से रोकना बेहद मुश्किल होगा। यहां यह जानना बेहद जरूरी होगा कि गुर्जर आंदोलन के पीछे ऐतिहासिक विसंगतियों का हाथ रहा है, जिनके कारण उन्हें अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए इतने बड़े आंदोलन का सहारा लेना पड़ा।

दरअसल ब्रिटिश राज में एक अधिनियम के माध्यम से कुछ जनजातियों व समुदायों को अकारण ही अपराधी के तौर पर चिह्न्ति किए जाने का खमियाजा बहुत से वर्गो को आजादी के इतने वर्षो बाद तक भुगतना पड़ा है। हालांकि आजादी मिलने पर इस अधिनियम की समीक्षा के लिए जो अय्यंगार समिति गठित की गई थी उसकी सिफारिश थी कि किसी भी जाति या समुदाय को पूरी तौर पर अपराधी मान लेने की अंग्रेजों की अवधारणा को समाप्त किया जाना चाहिए। इस कमेटी की सिफारिशों को माना तो गया, लेकिन इसी के साथ एक प्रावधान के तहत गैर-अधिसूचित नाम से एक अलग श्रेणी बना दी गई और उसमें उन जातियों को रख दिया गया जिन्हें अंग्रेजी राज अपराधी मानता था।

इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो यह बेहद जरूरी हो जाता है कि एक बार आरक्षण की पूरी प्रक्रिया को फिर से रिव्यू किया जाए, क्योंकि किसी पूरी जाति या समुदाय को अपराधी की संज्ञा दे देना अंग्रेजी मानसिकता हो सकती थी, लेकिन इस दौर में भी उस ग्रंथि के अंश बचे रहें यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। समाजशास्त्री लंबे समय से गैर-अधिसूचित श्रेणी को लेकर सवाल उठाते रहे हैं, लेकिन गुर्जर आंदोलन ने एक बार फिर इस मुद्दे पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता को महसूस कराया है।

राज्य सरकार व आंदोलनकारियों के बीच जो समझौता हुआ है उसे भी इसी पृष्ठभूमि में देखना होगा कि राज्य सरकार के सामने यह समस्या कोई एक दिन में पैदा नहीं हुई थी। पिछले वर्ष हुए आंदोलन से नीति-निर्धारकों को यह बात समझ में आ जाती तो शायद दुबारा आंदोलन की नौबत ही न आती, लेकिन अदूरदर्शी सोच के चलते समस्या के तात्कालिक हलों पर ही ध्यान केंद्रित किया गया।

दुबारा आंदोलन होने पर भी पूरे आंदोलन को इतना लंबा चलने देना भले ही राजनीतिक चालों के हिसाब से ठीक लगता हो, लेकिन इस बात पर विचार करने का समय शायद ही किसी को मिला हो कि इस तरीके से आम आदमी पर कितना असर पड़ेगा या कि सामाजिक समरसता पर कितनी गहरी चोट पड़ेगी।





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