संप्रग सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल में कभी अपनी यह मंशा नहीं छुपाई कि वह अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु करार करना चाहती है, लेकिन सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामदलों के विरोध के चलते वह मन मसोसकर रह जाती रही। फिर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी और इस मुद्दे पर वामदलों को मनाने के लिए उनके साथ एक समन्वय समिति बनाकर अपनी राय आगे बढ़ाती रही।
इस कवायद से यह प्रभाव और गहरा हुआ कि केंद्र सरकार इतनी ‘मजबूर’ है कि देशहित में भी कोई कदम नहीं उठा सकती, इसलिए अपने कार्यकाल के आखिरी वर्ष में सरकार वामदलों के प्रतिरोध को नजरअंदाज करके परमाणु करार को उसके आखिरी पड़ाव तक ले जाने का साहस दिखा रही है। इससे और कुछ हो न हो, वह अपनी गिरती हुई राजनीतिक साख को बचाने के बारे में तो सोच ही सकती है।
आसन्न आम चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस ही नहीं, सरकार में शामिल अन्य सहयोगी दलों को भी लग रहा है कि परमाणु करार को मूर्तरूप देकर जनता के बीच जाना कुछ अधिक सुविधाजनक होगा।
ऐसा लगता है कि सरकार की कमजोरियों व असफलताओं, खासकर महंगाई के चलते परमाणु करार को सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि और देशहित में की गई ऐतिहासिक पहल बताते हुए कांग्रेस व सहयोगी दल चुनावी लाभ लेने का विचार रखते हैं, इसीलिए सरकार परमाणु करार को अमलीजामा पहनाने के लिए अचानक जिस तरह सक्रिय हुई है, सरकार में शामिल दलों की भी इसके प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आ रही है। वामदल इस करार को लेकर अपने रुख में कोई यू टर्न लेंगे, इसकी कोई संभावना नहीं है, क्योंकि उनका यह रुख ही उनके लिए आम चुनाव में जनता के बीच जाने का मुद्दा होगा।
ऐसा लगता है कि परमाणु करार का निपटारा उसमें अंतर्निहित गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि उससे होने वाले राजनीतिक फायदों और नुकसान के आकलन के आधार पर होगा। करार पर आगे बढ़ने पर वामदलों द्वारा समर्थन वापसी के बाद यदि सरकार नहीं गिरे, तो यह प्रश्न जरूर उठेगा कि एक ‘अल्पमत’ या ‘कार्यवाहक’ सरकार क्या कोई बड़ा और महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय करार करने का नैतिक अधिकार रखती है।