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गुर्जर आंदोलन के सुलगते सवाल

दृष्टिकोण. gujjar एसटी में आरक्षण मांग रहे गुर्जर आंदोलन का शांतिपूर्वक समापन हो गया, यह अलग बात है कि छब्बीस दिन के इस आंदोलन के चलते लगभग 70 लोगों की जान गई व अरबों की सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ। देश तथा प्रदेश के नागरिकों को इसके कारण इस दौरान जो असुविधा हुई उसकी कीमत नहीं आंकी जा सकती।

भारी कशमकश के बाद हुए समझौते के अनुसार राज्य सरकार ने अलग से श्रेणी बनाकर पांच प्रतिशत में गुर्जर, बंजारा, गाडियालुहार और रायका तथा १४ प्रतिशत आरक्षण गरीब अगड़ों को भी घोषित कर दिया। इस प्रकार राजस्थान में आरक्षण की सीमा ६८ प्रतिशत हो गई, जबकि तमिलनाडु में यह सीमा ६९ प्रतिशत है और महाराष्ट्र में ५२ प्रतिशत।

झारखंड में यह सीमा ७३ प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। राजस्थान में जो व्यवस्था स्वीकार की गई है वह महाराष्ट्र के पैटर्न पर बताई जा रही है। इस व्यवस्था में सबसे बड़ा पेच यह है कि उच्चतम न्यायालय ने यह सीमा 50 प्रतिशत से अधिक न करने की घोषणा कर रखी है। राजस्थान में आंदोलन समाप्त हो गया, यह सबके लिए राहत की बात है। किसको कितना लाभ होगा, इसका विश्लेषण अभी लंबे समय तक होता रहेगा।

पर यह आंदोलन कुछ जलते हुए सवाल छोड़ गया है, जिनकी तरफ ध्यान देना बहुत जरूरी है। सबसे पहला सवाल तो यही है कि हमारे संविधान में किस प्रकार का समाज निर्मित करने की अवधारणा निहित है और हम कैसे समाज में बदलते जा रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने तो यही सोचा था कि भारत में एक समतावादी, जाति, वर्ण व वर्ग विहीन, धार्मिक भेदभाव से रहित, गरीबी रहित, सभी प्रकार के शोषण से रहित, आर्थिक गैरबराबरी रहित समाज की स्थापना हो।

इस प्रकार का समाज बनाने के लिए जिन उपायों की संकल्पना की गई, उसमें पिछड़ों के लिए आरक्षण भी एक उपाय था। आरक्षण व्यवस्था के उन्नायक स्वयं डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण व्यवस्था पिछड़ेपन को दूर करने का स्थायी समाधान नहीं है। अत: संविधान में यह केवल दस वर्ष तक के लिए रखा गया था। डॉ. अंबेडकर चाहते थे कि भारतीय समाज में समता तभी आ सकती है जब सबसे पहले यह संकीर्ण जातिवाद से मुक्त हो। अत: उन्होंने जाति तोड़ो का नारा भी दिया था।

पर क्या हमने आरक्षण को समाज में समता लाने का हथियार बनाने का प्रयास किया? शायद कभी नहीं। क्या इसके परिणामों की समीक्षा करने का प्रयास किया गया? कभी नहीं। क्या यह आभास भी मिला कि आरक्षण से जातिवाद टूट रहा है? कभी नहीं। इसके उलट इससे जातिवाद के विष को और विषाक्त बनाया और जाति संगठनों के निर्माण में योगदान दिया।

राजनीतिक दलों ने इस व्यवस्था को वोट-बटोरू औजार में बदल दिया। हर दल ने स्वयं को पिछड़ों का हमदर्द साबित करने का प्रयास किया, इसलिए कोई भी दल इस व्यवस्था की समीक्षा करने या इसमें परिवर्तन करने की बात कहने से बचने लगा। नतीजा यह हुआ कि आरक्षण की व्यवस्था बराबर जारी रही और निकट भविष्य में इसका अंत दिखाई नहीं देता। हर समुदाय आरक्षण को अस्थायी व्यवस्था नहीं, अपना हक मानने लगा। हर जाति यह मान रही है कि उसका उत्थान आरक्षण के द्वारा ही संभव है। उधर, आरक्षित जाति के संपन्न वर्ग भी इस सुविधा को छोड़ना नहीं चाह रहे। इसीलिए क्रीमीलेयर का मसला भी तय नहीं हो पा रहा। कैसी विडंबना है कि कोई भी जाति ऐसी नहीं कि जो अपने को पिछड़ा मानने में गर्व की अनुभूति न करती हो।

जब एक जाति विशेष के लोग सरकार को धमकी देते हैं तो कोई राजनीतिक दल नहीं बोलता। यह चुप्पी समाज को तोड़ने की प्रक्रिया को तेज करती है। जब गुर्जर आंदोलन आरंभ हुआ था तभी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने धमकी दी थी कि यदि आंदोलन हिंसक हुआ तो उनसे बुरा कोई नहीं होगा, लेकिन इसके बाद क्या हुआ सभी के सामने है।

अब समय आ गया है कि हम आरक्षण व्यवस्था के परिणामों तथा प्रावधानों की समाजशास्त्रीय व्याख्या भी करें। उनके औचित्य पर बहस करें, उनके प्रभावों का मूल्यांकन करें। तमिलनाडु में आरक्षण की व्यवस्था इस प्रकार है-बैकवर्ड क्लास २३ प्रतिशत, बैकवर्ड क्रिश्चियन 3.5 प्रतिशत, बैकवर्ड मुस्लिम 3.5 प्रतिशत, मोस्ट बैकवर्ड क्लास 20 प्रतिशत और अजा/जजा १९ प्रतिशत। इस व्यवस्था का मिलान राजस्थान की ६८ प्रतिशत व्यवस्था से करके देखिए, साथ ही यह भी कि जब उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। राजस्थान ने महाराष्ट्र पैटर्न पर जो व्यवस्था की है, क्या हमने महाराष्ट्र में आरक्षण व्यवस्था का विश्लेषण किया?

किसी भी जाति या समुदाय की पक्षधरता करने से समाज को विघटन का प्रसाद नहीं मिलना चाहिए। कांग्रेस ने आरक्षित वर्ग में आने वाली जातियों को तथा अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी ताकत का आधार बनाया और उसने यही संदेश दिया कि इस वर्ग की हिमायती तो केवल कांग्रेस है। उसने अपने संदेश को लंबे अरसे तक भुनाया भी, लेकिन कांग्रेस संस्कृति में पके-पले विश्वनाथ प्रतापसिंह ने जब कांग्रेस का दामन छोड़ा, तो कांग्रेस की जड़ों पर ऐसा प्रहार किया कि पिछड़ों को मायावती ले गई तो अल्पसंख्यकों के मसीहा मुलायम सिंह यादव बन गए। वामपंथी भी मुस्लिम तुष्टीकरण की राह पर चलते रहे।

यह सब देखकर पुराने संस्कारों से धुली और सवर्णो की ताकत पर चली भाजपा को भी अपनी राह बदलनी पड़ी और उसे भी अजा/जजा हिमायत और अल्पसंख्यक प्रेम के कुछ मुखौटे धारण करने पड़े। उसके लिए भी जरूरी हो गया कि वह स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दल साबित करे। दरअसल आरक्षण का मसला अब कोई साधारण मसला नहीं रह गया है, इसका संबंध समाज के विकास, समरसता और एकता तथा समाज में व्याप्त गैर-बराबरी को मिटाने से है।

अगर यह प्रावधान यह सब नहीं कर पाता और इसके विपरीत जाकर समाज को तोड़ता है, समाज में जातिवादजन्य वैमनस्य फैलाता है और समाज के विकास को रोकता है, तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए। जातिवाद और आरक्षण के कारण हमारे जनतंत्र की रक्षा को समर्पित संस्थाएं कमजोर हो रही हैं। लोकसेवा आयोग, विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं इसके कारण पतन की ओर जा रही हैं। इस काम में हम जितनी देर करेंगे, उतना ही इस देश और समाज को नुकसान होगा।
- लेखक राजस्थान साहित्य अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे हैं।





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