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बढ़ती महंगाई में ही जीने की विवशता

महंगाई थामने की सरकार की तमाम कोशिशों पर पेट्रो पदार्थो की बढ़ी कीमतें इतनी भारी पड़ गईं कि महंगाई दर का आंकड़ा ग्यारह को पार कर गया। आंकड़ों के आईने में यह जितना गंभीर लगता है, वास्तविकता उससे कहीं अधिक भयावह है। 11.5 की यह महंगाई दर दो सप्ताह पहले 7 जून की है वह भी थोक भावों पर आधारित। आज यह किस ऊंचाई पर है, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। पिछले कुछ महीनों से लगातार महंगाई को रोकने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार भी अब यह मान चुकी है कि इसे रोक पाना उसके लिए संभव नहीं रहा। ऐसा लगता है कि अभी कुछ और महीनों ही सही लोगों को बढ़ती महंगाई के साथ ही जीना होगा।

इस महंगाई के लिए अंतरराष्ट्रीय स्थितियों को भले ही जिम्मेदार ठहराया जाए, लेकिन इससे घरेलू हालात की बिगड़ती तस्वीर संवर नहीं सकती। यह संयोग ही है कि 13 साल पहले जब महंगाई दर सर्वाधिक हुई, तो डॉ. मनमोहन सिंह देश के केवल मंत्री थे और आज जब दो अंकों को पार कर गई तब वे प्रधानमंत्री हैं। महंगाई की ये दोनों ऊंचाइयां आर्थिक उदारीकरण के दौर में देखने को मिलीं जो देश की अर्थनीति पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस कराती हैं।

महंगाई की तेजी के लिए सीपीएम यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है, तो यूपीए की चेयर पर्सन सोनिया गांधी राज्य सरकारों को। वित्तमंत्री कहते हैं कि यह महंगाई तो अपेक्षित थी जिसके प्रति उन्होंने पहले ही आगाह किया था। यह वक्त इस तरह की राजनीति करने या बयानबाजी करते हुए जिम्मेदारी से मुक्त होने का नहीं है। महंगाई के मद्देनजर यह राजनीतिक फलितार्थ पर विचार करना गैर जरूरी लगता है कि अब केंद्र सरकार परमाणु करार को आगे बढ़ाएगी या नहीं, वामदलों के समर्थन का क्या होगा या आम चुनाव समय पर होंगे या समयपूर्व।

ज्यादा जरूरी यह है कि महंगाई पर काबू कैसे पाया जाए और यदि काबू पाया जाना संभव नहीं है, जैसा कि केंद्र सरकार भी मान रही है, तो आम आदमी को राहत पहुंचाने के वैकल्पिक उपाय तलाश किए जाएं। महंगाई दर ने ऊंचाई के किस कीर्तिमान को हासिल किया और किस रिकॉर्ड को तोड़ा, यह जानना आम आदमी की ¨चताआंे को कम करने वाला नहीं। महंगाई रोकने के दीर्घकालीन उपायों पर विचार के साथ-साथ तात्कालिक रूप से ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए, जिससे आम उपभोक्ता वस्तुएं आम आदमी की पहुंच तक बनी रहें।





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